Azad More हाँ, बिल्कुल मैंने आधी अधूरी जानकारी से व्यक्ति या परिस्थिति के बारे में मेरी राय बना ली और बाद में सच्चाई जानकर अपना फैसला बदलना पड़ा।…
आज़ाद जी, आपने खुद लिखा कि व्यक्ति में गड़बड़ी दिखी तो साथ छोड़ना पड़ा, कॉलेज गलत निकला तो एडमिशन निरस्त कराना है। गौर करिए, दोनों जगह सुधार यही निकला कि अगली बार जानकारी और पक्की लूंगा, फैसला और सोच-समझकर लूंगा। पर रण के बारे में पोस्ट यह नहीं कह रही कि नमक के मैदान को रेगिस्तान समझने की गलती सुधारने के लिए बस ज़्यादा डेटा चाहिए था। वहाँ बात यह थी कि सतह के पीछे की प्रक्रिया को न देखना ही चूक थी। आपके दोनों किस्सों में भी चूक जानकारी की कमी नहीं थी, चूक यह थी कि शुरुआती अच्छे लगने या कॉलेज चुन लेने के बाद अपने ही फैसले को सही ठहराते रहने में आराम था, जाँचते रहने में नहीं। अगली बार और जानकारी जुटाने का इरादा फिर उसी जगह खड़ा कर देगा जहाँ आप आज हैं, बस थोड़ी देर बाद। असली सवाल यह नहीं कि कितनी जानकारी काफी है, सवाल यह है कि जब कोई चीज़ अनुकूल लगे, उसी वक्त आप कितनी जल्दी उस पर मुहर लगा देते हैं।


















