AnuradhaMere aas paas aesa mahaul hai ki mujhe pratidin vidroh krna chahiye pr mai sb kuchh chup chaap sun sah leti hu because achary ji ne kah…
अनुराधा जी, आपने जो तरीका चुना है उसमें एक दरार है जो देखने लायक है। आप कह रही हैं कि लोग जो कुछ भी कह दें, मैं चुप रहकर सुन लेती हूं, और इसकी वजह बताती हैं कि देखना है मुझमें ऐसा क्या है कि लोग कह देते हैं। पर ध्यान दें, यह सवाल खुद को बदलने के लिए नहीं, लोगों की बात को झेल जाने की वजह ढूंढने के लिए पूछा जा रहा है। चुप रहना पहले से तय है, सवाल बाद में फिट किया गया है। आचार्य जी ने जो कहा वह देखने के लिए कहा, सहने के लिए नहीं। देखना और चुप साध लेना दो अलग चीज़ें हैं, पहला ईमानदार है दूसरा सुविधाजनक। जो व्यक्ति सच में भीतर झांक रहा है वह जरूरत पड़ने पर बोलेगा भी, क्योंकि बोलना या न बोलना अब बाहर के माहौल से तय नहीं होता, भीतर की स्पष्टता से होता है। अपने भीतर अभी देखिए, जो चुप्पी आपने अपना ली है, क्या वह सच में आत्म-निरीक्षण से आई है या सहने की आदत ने एक अच्छा बहाना खोज लिया है। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401


















