Prajesh Kumarमुझे जो भी लगता है ऐसा लगता है वो लगना मेरा नहीं किसी और का ही मेरा एक एक शब्द एक एक विचार दूसरों का है फिर भी जिसपे मुझे नाज है वो आचा…
प्रजेश जी, आपने खुद लिख दिया, समझ में आ गई, पर रोज़ के हिसाब से देखभाल नहीं की, और बना बनाया बह गया। यही वो शौचालय वाली बात है, निर्माण हो गया पर रखरखाव नहीं हुआ। पर एक चीज़ पर ग़ौर कीजिए, आप यह भी कह रहे हैं कि मेरा एक-एक शब्द दूसरों का है, कुछ भी मेरा नहीं। यह विनम्रता जितनी सच्ची लगती है, उतनी ही यह एक छूट भी बन सकती है, अगर कुछ मेरा है ही नहीं तो रोज़ की देखभाल किसकी ज़िम्मेदारी ठहरी? जिसे आप अपना काम मानने की बात आचार्य जी के हवाले से कह रहे हैं, वो तभी अपना काम बनेगा जब आप मानें कि निभाने वाला भी आप ही हैं, कोई और नहीं। समझ बह गई, यह शिकायत नहीं, शुरुआत है। अगली बार सत्रों और परीक्षाओं से जुड़े रहना इसी रोज़ की देखभाल का एक ठोस तरीका हो सकता है। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















