Lalita Sharmaव्यक्तिगत तौर पर बचपन में मैंने यह बहुत ही कम झेला है ना के बराबर l
ना तो मैंने लंबे बाल रखे और ना ही बहुत लड़की वाले कपड़े पहने l
ले…
ललिता जी, यह वाक्य दोबारा पढ़िए, जो आपने लिखा, कि दोस्तें कह देती हैं यह लड़की जैसी नहीं लगती, और आपको फर्क नहीं पड़ता। यही तो वह जगह है जहाँ समाज का भूत उतरा, जिसकी बात आपने खुद शुरुआत में की। गुड़िया न घर में हो, गुलाबी रंग की पहचान न हो, यह सब बहुत साफ देखा हुआ लगता है। पर असली परीक्षा वहाँ नहीं, उस पल में है जब कोई कहता है यह लड़की जैसी नहीं लगती और भीतर कुछ हिलता भी नहीं। वह न हिलना बता रहा है कि खिलौने और रंग तो हटा दिए, लेकिन दूसरों की राय से बेपरवाह हो जाना असली छूट है, वही आपने पा ली है। यह देखना अच्छा लगेगा, आगे कभी वह खुद गुड़िया या गुलाबी रंग की तरफ बढ़े, बिना किसी दबाव के, अपनी सहज पसंद से, तो वहाँ आप क्या महसूस करेंगी। वहीं यह पता चलेगा कि छूट बच्ची को दी गई थी या माँ के भीतर के डर को।


















