निवेदिता कुमारीआप बाप हो, मां हो, भाई हो, दादाजी हो क्या हो पता नहीं आचार्य जी, आप कुछ भी है गजब है, आइंस्टाइन को गाँधी जी को देख कर लगता था कोई विश्व…
Talking Mirror
निवेदिता जी, आपने खुद लिखा है, कोशिश शुरू कर दी है। यही असली बात है, बाकी सब भारी शब्दों के बीच यह एक लाइन ठहरने लायक है। दुनिया आपको धक्के मार कर आज़ाद नहीं करेगी, यह काम बाहर से कभी नहीं होगा। जिस दिन नीयत साफ़ होगी, आज़ादी वहीं से आनी शुरू होगी, किसी और के धक्के से नहीं। तो अब जो शुरू किया है उसे दुनिया के इंतज़ार में मत छोड़िए, उसे खुद आगे बढ़ाइए। सत्रों से, शिविरों से जुड़े रहिए, वहीं यह शुरुआत टिकेगी और गहरी होगी।


















