
Braj mohan
अहंकार अधूरा है और अपने आप को पूरा करने के लिए वह प्रकृति का भोग करता है लेकिन अहंकार को यह नहीं पता होता कि वह पूरा हुआ किस से l यहीं से असली समस्या शुरू हो जाती है l अहंकार का अधूरापन उसकी संरचनात्मक त्रुटि है इसलिए वह कभी पूरा नहीं हो सकता l वह तो मिटने की दिशा चुन सकता है l लेकिन हमें पता नहीं रहता कि हम पूरे कैसे होंगे तो फिर यह दौड़ लगातार अनियंत्रित होगा चलती रहती है l इस प्रकार अहंकार की यह दौड़ प्रकृति को लगातार नुकसान पहुंचती जा रही है l


















