Sandhyaये प्रश्न यही तक नहीं रुकता है ।
एक स्त्री को मानव को मन नहीं जाता है अगर वो सदी नहीं करती तो जरूर उसका कोई चक्कर है तभी शादी नहीं कर र…
संध्या जी, आपने दो अलग-अलग लोगों का नाम ले लिया: समाज, जो शादी न करने वाली स्त्री पर चक्कर का शक करता है, और घरवाले, जो बच्चों को अपने नाम और इज्ज़त का सामान बना लेते हैं। पर दोनों जगह सवाल एक ही है: बच्चा कौन है, यह देखा ही नहीं जाता, उसे समाज के सामने रखी जाने वाली अपनी तस्वीर में बदल दिया जाता है। चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, जब तक वह तस्वीर में फिट बैठता है, उसे प्यार मिलता है, और जिस दिन वह अपनी समझ से कोई फ़ैसला ले लेता है, उसी दिन तस्वीर बिगड़ने का डर गुस्से में बदल जाता है। तो जो लोग ताने मारते हैं, वे असल में अपनी ही इज्ज़त पर चोट महसूस कर रहे होते हैं। और यही बात उस पर भी लागू होती है जिसके भीतर ऐसे ताने गहरे बैठ चुके हों: ज्ञान और शिक्षा से निर्णय लेने की ताक़त तब भी बनी रहती है, पर तभी जब वह ज्ञान बार-बार सुना और जिया जाए। आचार्य जी के सत्रों और रिकॉर्डिंग्स में इसी पर बात होती है कि अपनी समझ से जीने की हिम्मत कैसे आती है, उन्हें सुनना शुरू कर दीजिए। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401


















