Premlataजीस बात को सही मानती हू उसे परखना भी चाहती हूॅ।
Talking Mirror
प्रेमलता जी, यहीं पर थोड़ा और भीतर झाँकिए। परखना चाहना एक बात है, और परखते वक़्त जो सामने आए उसे स्वीकार करने को तैयार रहना बिल्कुल दूसरी बात। मार्शल के लिए असली परीक्षा घोल पीने में नहीं, उस नतीजे को मानने में थी जो उनकी मौजूदा समझ को तोड़ सकता था। तो अपनी किसी मान्यता को लीजिए और पूछिए, क्या मैं सच में तैयार हूँ कि वह ग़लत निकले, या मैं परखने का नाटक सिर्फ इसलिए कर रही हूँ ताकि भीतर से यक़ीन मिल जाए कि मैं पहले से ही सही थी? यह फ़र्क़ शब्दों में नहीं, उस पल में दिखेगा जब प्रमाण आपके विरुद्ध खड़ा हो। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















