
1️⃣ जहाँ कई विकसित देशों में महिलाओं की खेल उपलब्धियाँ राष्ट्रीय सफलता का बड़ा आधार हैं, वहीं भारत में अक्सर लड़कियों को खेलों से हतोत्साहित किया जाता है और उनके पहनावे या शरीर तक चर्चा सीमित रह जाती है। इसके पीछे कौन-सी गहरी मान्यताएँ काम करती हैं? हाल के समय से कुछ उदाहरण देकर बताइए कि कैसे लोकधर्म इसमें एक बड़ी भूमिका निभाता है। उत्तर 1️⃣ : हमारा समाज लोकधर्म के हिसाब से ही चलता है जो कि समाज में प्रचलित मान्यताओं और संस्कृतियों को देखकर समझ आता है। समाज में महिलाएँ का जो स्थान है उससे साफ तौर पर समझा जा सकता है कि वो श्रुति धर्म पर नहीं बल्कि स्मृति धर्म पर चलता है। जैसे कि मनुस्मृति में लिखा है कि एक महिला को हमेशा पिता, पति या पुत्र पर आश्रित ही रहना है, तो इस ही प्रकार की धारणा हमें पूरे समाज में फैली हुई दिखती है। हाल के उदाहरण लेकर समझें तो देखा जा सकता है किस प्रकार महिलाएँ स्वयं ही कैसे रूढ़िवादी धर्म का हिस्सा बनकर खुद के ही शोषण का कारण बन गई हैं। और वो ऐसे कर्मकाण्डों में हिस्सा लेने को ही धर्म मानती हैं। वो ये तक नहीं समझ पातीं कि उनको ऐसे ही लोकधर्म में फँसाकर उनको दबाए रखने का उपक्रम किया जा रहा है। 2️⃣ आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी क्यों कहते हैं? उत्तर 2️⃣ : आचार्य जी ने AP Framework द्वारा समझाया है कि अहंकार मनुष्य के शरीर के साथ ही जन्म लेता है और जब तक शरीर मनुष्य के इस रूप में रहता है तब तक उसमें अहंकार भी रहता ही है। हम उस अहंकार को क्षीण भी कर सकते हैं और सघन भी; वो हमारे चुनाव पर है। हम में स्वयं के प्रति कितना प्रेम है, ये उस पर निर्भर करता है कि हम अहंकार को सघन करने की दिशा में बढ़ेंगे या क्षीण करने की। अहंकार जितना अधिक सघन होगा वो उतने ही सहारे ढूँढेगा और उतना ही अधिक अपनी वृत्तियों पर चलने में सुविधा मानेगा। इसके विपरीत अहंकार जैसे-जैसे क्षीण होता जाएगा, वो निरालंब होने की ओर बढ़ेगा और दूसरों का सहारा स्वयं बनेगा। 3️⃣ क्या आप जिन जगहों पर काम करते हैं या पढ़ते हैं, वे आपको खेल के लिए प्रोत्साहित करती हैं? अगर आप कोई खेल खेलते हैं, तो अपनी फ़ोटो या वीडियो कम्युनिटी पर ज़रूर साझा करें। उत्तर 3️⃣ : मेरा खुद का ही व्यवसाय है जहाँ मैं दोपहर बारह से रात के 9:30 तक काम करता हूँ। इस समय के बाद मैं अक्सर घर पहुँचकर TV देखकर सो ज़ाया करता था। आचार्य जी से जुड़ने के बाद मैं अपने काम से आने के बाद सर्दियों में cycling करने जाता था और अभी badminton भी शुरू किया है। सत्रों से जुड़ने के बाद से खुद को चैलेंज करने में मजा आने लगा है। साफ-साफ समझ आता है कि अंदर कुछ है जो बहुत सारे तर्क दे रहा है खुद को न टूटने देने के, उस सब के बवाजूद भी खुद को खुद से तोड़ने में और उसके बाद के संघर्ष के बाद खुद को शाबाशी देने में मज़ा आने लगा है। कई बार जब उस बचने की पुकार और लालच के आगे घुटने टेक देता हूँ तो बाद में दुख और बेचैनी भी होती है। वो दुख दोबारा न उठ पाए, इसलिए उसको भी अच्छी तरह धयान में रखता हूँ कि ये क्यों ही उठा। Badminton खेलते हुए ही कल का ही वीडीओ साझा कर रहा हूँ।



















