Khushboo Kumariमेरी अभी ऐसी ही स्थिति है प्रतिदिन अपनी आदतों का गुलामी करती हूँ , प्रतिदिन सोचती हूँ कि जल्दी उठना है , व्यायाम करना हैं …
खुशबू जी, आपने खुद ही वो जगह पकड़ ली है जहाँ असली काम होता है। अभी तक आप आदत को सिर्फ देख रही थीं, कोसती रही होंगी खुद को, और अगली सुबह फिर वही टलना। पर जो सवाल आपने अभी उठाया है वो देखने से आगे का है, कि जल्दी उठना, पढ़ना, व्यायाम छोड़ने के पीछे असल में क्या बचा जा रहा है, वो आराम, वो बहाना, वो नींद में पड़े रहने की सुरक्षा। उसे छोड़ने की कीमत क्या लगती है, क्या असुविधा, क्या डर, क्या पुरानी आदत का आराम, ये साफ़ नाम लेकर देखिए। जब तक कीमत धुंधली रहेगी, इरादा भी धुंधला रहेगा। आज अगर सच में तैयार हैं वो कीमत चुकाने को, तो कल सुबह वही फ़र्क दिखेगा जो आज तक नहीं दिखा। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















