Shalinee Pandey हर घर में लगभग यही हाल है हमारे माताओं की या हम लोगों की
अच्छी बेटी, अच्छी बहु, अच्छी मां घर के लक्ष्मी यह सब कहकर हमारे ऊपर भी सारे …
शालिनी जी, जो आपने देखा वह सिर्फ शब्दों का खेल नहीं है। देवी, लक्ष्मी, अच्छी बहु - ये उपाधियाँ तभी बोझ बनती हैं जब इन्हें स्वीकार करने वाला व्यक्ति भी भीतर कहीं इसी भूमिका से अपनी पहचान बना बैठता है। सवाल यह नहीं कि परिवार ने क्या कहा, सवाल यह है कि क्या आपने भी कभी इस "अच्छी होने" में अपनी कीमत ढूंढी, जिसके बाद इनकार करना मुश्किल हो गया? जिसे असली आज़ादी चाहिए, उसे यह भी देखना होगा कि उपाधि मिलते ही उसमें कितनी सुविधा भी थी - प्रशंसा, स्वीकृति, महत्व का एहसास। बोझ और वह सुविधा साथ-साथ आए थे। आपके अपने जीवन में वह जगह कौन सी है जहाँ "अच्छी होने" की यह माँग अब भी आपसे मनवाई जा रही है, और वहाँ आप इनकार करने से क्यों रुक जाती हैं? और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401


















