Neelam Raniजिस बात को मैं सही मानती हूं केवल उसकी पुष्टि चाहती हूं।
Talking Mirror
नीलम जी, यह स्वीकार कर लेना ही अपने आप में बड़ी बात है, पर यहीं रुकना नहीं है। असली सवाल यह है कि पुष्टि ही क्यों चाहिए, जाँच क्यों नहीं। जब कोई धारणा मेरी बन जाती है, तो उसका गलत साबित होना मुझे अपना गलत साबित होना लगने लगता है, इसलिए मन चाहता है कि बात सही ठहरे, चाहे वह वास्तव में सही हो या न हो। अगली बार जब कोई आपकी किसी मान्यता पर सवाल उठाए, बस इतना देखिए कि भीतर पहली हलचल क्या होती है, बात समझने की या अपना बचाव करने की। वह हलचल ही बताएगी कि मान्यता के पीछे कौन खड़ा है।


















