
इस सवाल का जवाब कुछ समय पहले पूछा जाता तो शायद अलग होता ।मगर आचार्य जी से जुड़ने के बाद ये विचार बदल चुका है । जैसे हमने बच्चों को अपने स्वार्थ के लिए पढ़ाना शुरू किया था। मगर अब हम उनसे ऐसा जुड़ गये हैं ,कि उनसे हमसे पैसे मिले या न मिले मगर उनको पढ़ाने में अच्छा लगता है। हमको तो याद नहीं रहता कि इस काम से पैसे मिलेंगे जब वो लोग देते तब विचार आता है कि इस काम के बदले हमें कुछ राशि मिल रही है। इधर हमारे हाथ में पैसे आते हैं उधर हम अपना इनरोलमेंट कर देते हैं। अबकी महीने के आखिर में पैसे मिल गये थे हमने पहली तारीख को इनरोलमेंट कर दिया। अभी एक बच्चे के नहीं मिले हैं क्योंकि उसके पापा का एक्सीडेंट हो गया था। उन्होंने अब काम करना शुरू किया है ।ये सब लोगों प्राइवेट काम करते हैं।जब जायेंगे उतना ही मिलेगा।मिल गये तो भी ठीक नहीं मिले तो भी ठीक। और एक बात बच्चे कल कह रहे थे कि वहां स्कूल में बच्चे पूछ रहे होंगे किससे पढ़ते हो वो मैम बूढ़ी है कि जवान है तो हमने पूछा वो क्यों पूछ रहे थे ।तो बच्चे कहने लगे कि वो उन बच्चों से कह रहे थे तुमको सब कैसे आता है।तब बच्चे कह रहे आप बूढ़ी है जवान हमने कहा कह देना हमारी मैंम के दांत नहीं है और वो डण्डा लेकर चलती है ।तब एक बच्चे ने कहा बूढ़ी जवान से क्या मतलब हमको पढ़ाई से मतलब तब हमने कहा और बच्चों को भी ले आना। हम उनको कुछ भी पढ़ाते नहीं है बस उनकी गलतियों को सुधारने में मदद करते हैं।हमको इसलिए इन बच्चों के साथ अच्छा लगता है।ये चीज हमने आचार्य जी से सीखा है।हम अपनी तरफ से बच्चों पर कोई बोझ नहीं डाले बस उनको उन्ही की तरह बताते हैं । और एक बात याद आई की हम वो लड़की रहे जो हर किसी के पास नहीं बैठते थे न अपनी कोई चीज किसी को छूने देते थे । और आज इतने बदल गये हैं कि हमारे बिस्तर पर हमारे घर के बगल के बच्चे यहां तक बिल्ली के बच्चे उधम मचाते रहते हैं हमको अब बुरा नहीं लगता। और एक बात याद आई कि जन्माष्टमी वाले दिन जब सत्र चल रहा था । बिल्ली का बच्चा बिस्तर पर चढ़ गया हमने कहा नीचे जाओ वो वहां से उतरा बेड के नीचे से होकर हम कुर्सी पर बैठे थे । मेरे पैर पर कसके मारा । अब ये इतना घुल मिल गए हैं कि जहां खाना खाने बैठो आके बस म्यायु म्यायु करने लगते हैं। आज सुबह से आय नहीं तो सन्नाटा लग रहा है। और ये सारे बदलाव के पीछे आचार्य जी की शिक्षाएं है वरना हम किसी से बात ही नहीं करते थे । आत्म केन्द्रित रहते थे । क्या यही प्यार है।जो आचार्य जी से सीखा है। अब अगर आयेंगे भी तो इन बच्चों का ए क्लास कंपलीट करके क्योंकि जुड़े तो स्वार्थ वश थे मगर अब उनसे प्रेम हो गया है ।हम इनको अधूरे रास्ते में कैसे छोड़ सकते हैं। हमने उनको दूसरे टीचर से छुड़वाया और अब हम उनको क्लास कंपलीट किये बिना कैसे छोड़ सकते हैं उनकी ये कक्षा पूरी करने के बाद ही छोड़ेंगे ।वरना इनकी पढ़ाई पर अवरोध पैदा हो जायेगा।


















