Manjula Prajapatiहां कभी-कभी डर तो लगता है मेरा चुनाव गलत हुआ तो पर कभी-कभी निराशा भी होती है के अगर सही समय में सही चुनाव करलो तो जीवन जीने में आनंद आत…
Talking Mirror
मंजुला जी, ध्यान दीजिए कि आप डर और निराशा को दो अलग चीज़ें मान रही हैं, जबकि दोनों एक ही जगह से उठ रहे हैं। डर कहता है 'गलत चुनाव हुआ तो?', और निराशा कहती है 'सही समय पर सही चुनाव नहीं हुआ'। दोनों में वह मान्यता छुपी है कि जीवन का आनंद किसी बाहरी सही-निर्णय पर टिका है। पूछिए कि यह 'सही समय' और 'सही चुनाव' तय कौन करता है, और क्या वह तय करने वाला खुद स्पष्ट है कि उसे चाहिए क्या। जब तक यह साफ़ नहीं, हर चुनाव के बाद भी वही डर और वही निराशा नए रूप में लौट आएँगे।


















