
Priya goyal
में भी इस पोस्ट से ये समझ पायी की अहं अपने आप को सही साबित करने कि लिए बात का मतलब बदलता है सामने वाले को झूठा साबित करना चाहता है पर जब हम ख़ुद ये कर रहे होते है तब हमारा अहम ये मानने को भी तैयार नहीं होता की उसने अपने ही अंदर जीत कि लिए क्या क्या दाव पेंच खेले है और अंतत उसे ख़ुद की बात ही सही लगने लगती है


















