Sonamji mujhe bachpan se कला मे बहुत मन लगता था पर kisi ne v प्राथमिकता nhi di sab ko bas sadi ki padi thi yeha tak ki mai hote umar se ki …
Talking Mirror
सोनम जी, आपने खुद लिखा है, जब उम्र छोटी थी तब भी कला में ढेरों चीज़ें बनाती थीं। वो जिज्ञासा किसी ने सिखाई नहीं थी, वो अपने आप जगी थी। शादी के बंधन ने उस पर ताला लगाया, ये सच है और इसे झूठला देने की ज़रूरत नहीं। लेकिन ताला लगना और चाबी खो जाना दो अलग बातें हैं। जो चीज़ बचपन में खुद जागी थी, वो आज भी वहीं दबी बैठी है, बस इंतज़ार में कि कोई फिर से पूछे। सवाल ये नहीं कि किसी और ने रास्ता बंद किया या नहीं, सवाल ये है कि आज, इस उम्र में, आप उस दरवाज़े की तरफ फिर मुड़ती हैं या नहीं।


















