
आप बिल्कुल सही कह रहे हैं अहंकार उधार के सहारों और पहचानों पर निर्भर होकर बंध जाता है। मेरे जीवन का "तेल" है- आर्थिक परनिर्भरता, मेरे परिवार के सदस्य मेरी सभी मूलभूत आवश्यकताओं के लिये पैसे देते हैं लेकिन उनसे ये सुरक्षा लेकर भी मैं हमेशा असुरक्षित ही महसूस करती हूं क्योंकि उन्होनें मुझ पर इन्वेस्ट किया है,मुझे हर तरह की सुरक्षा दे रहे हैं तो कभी न कभी,किसी न किसी तरह से वसूली करेंगे जरूर। जिस तरह से अत्यधिक कीमती तेल मिल जाये फिर भी देश गरीब, असुरक्षित रह सकता है उसी प्रकार अगर बड़े भाई-बहन समझदार नही हैं तो उनसे जितनी ज्यादा आर्थिक सहायता,उतनी ज्यादा गुलामी,उतना कर्ज और उतनी ही असुरक्षा बढ़ती है। आचार्य जी को सुनने से पहले मैं अज्ञान और नासमझी में आंखें मूंदकर गोते लगा रही तब तो इन चीजों के विषय में जानकारी रखने की जरूरत ही नहीं महसूस होती थी कि मेरी वास्तविक पहचान,मेरा असली महत्व किसमें है कहां ढूंढू लेकिन अब नहीं ज्यादा तो कम से कम पल भर के लिये एक सार्थक जीवन जी लेने की अदम्य उत्सुकता है। अविद्या के बिना और विद्या के साथ-साथ सार्थक जीवन जीने की शुरुआत न कर पाने से मुझे मेरी सुरक्षा,पहचान या महत्व का एहसास कहीं खो गया सा लगता है सवाल पर सवाल कौंधते हैं अगर सार्थक नही तो जीवन है ही क्यों? मैं अब स्पष्ट देख पा रही हूं कि मेरी निर्भरता है इस समय सबसे पहले परिवार पर ओर फिर मुझ पर स्वयं, परिवार पर से निर्भरता हटाये बिना मैं आज़ाद एवं सार्थक जीवन नहीं जी सकती और अब कुछ भी हो जाये मैं ये नहीं होने दे सकती, बहुत हो गया जिन्दगी का मज़ाक, काफी हो गयी अहंकार की मौज़ और बहुत जी लिया सड़ा हुआ जीवन अब और नहीं।


















