Ritu sahu ज्यादातर इच्छा यही रहती है कि दूसरों के सामने कैसे अच्छा बना जा सके न कि खुद में बदलाव लाया जाए कि कैसे अपने आप को नीचे , बेकार स्तर स…
Talking Mirror
रितु जी, आपने खुद लिखा है कि दूसरों की नज़रों से देखने पर अंदर का झूठ छिप जाता है, और फिर अगली ही पंक्ति में सवाल पूछ रही हैं कि सच में जो जरूरी है वही कर रही हूँ या दूसरों के सामने कुछ बनने की कोशिश। यही सवाल पूछते रहना ही वो झांकना है जिसकी बात आपने की, न कि कोई एक बार का फैसला जो हो जाए और खत्म। बाहर निकलने से पहले आईने के सामने जो एक पल रुककर खुद को जांचने का मौका मिलता है, असली काम वहीं है, किसी और के चेहरे में नहीं। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















