sunita barnwal हमारी पहचान ही उधार की होती है जब कोई चला जाता है या कोई किरदार छूट जाता है तो लगता है जिससे मै कुछ हूं ही नहीं
Talking Mirror
सुनीता जी, आपने बात को सीधा उस जड़ तक ले गईं, पहचान उधार की है। मगर एक बार देखिएगा, यह देख लेना अपने आप में एक नई पहचान तो नहीं बन जाता, अब मैं वो हूं जिसने देख लिया कि पहचान उधार की है। साइकिल यहां भी वही है, बोझ थोड़ा बदल गया है, नाम बदल गया है, धकेलना अब भी जारी है। जो जाना असली है वह उस उधार को हर बार फिर से पकड़ने से रुकना है, एक बार पकड़कर संतोष कर लेने से नहीं।


















