
क्या आपने कभी किसी व्यक्ति या परिस्थिति के बारे में अधूरी जानकारी के आधार पर राय बना ली और बाद में सच्चाई जानकर अपना निष्कर्ष बदलना पड़ा ? अपना अनुभव टिप्पणी में साझा कीजिए। अभी जो मैं महाराष्ट्र पैदल चल रहा हूं तो जो एक एक कदम आगे बढ़ा रहा हूं तो मेरी जो राय इस राज्य के स्थिति के बारे में मैंने पकड़ रखी थी वह धीरे धीरे टूट फूट हो रही हैं। जैसे मुझे जो कुछ मिला है जीवन में उसमे सबकुछ संयोग से हैं। यह बात अब हर जगह को देखते देखते दिख रही हैं। आचार्य जी ने मुझे पकड़ा है। मेरी उसमें कोई मेहनत नहीं। अब भी संस्था ने ही बहुत सारे तरीके निकाले हैं कि मैं गीता सत्र से जुड़ा रहु। सच में भागने की संभावना बनी रहती हैं क्योंकि आसपास लोकधर्म प्रभावी हैं और भीतर भी उसका राज अभी कायम है। हर चुनाव उसका ही संघर्ष होता हैं।


















