Palak मेने भी अपने बच्चों को ही अपनी सबसे बड़ी मजबूरी बना लिया है। जिसके कारण मैं सत्रों से भी दूर होते जा रही हूं।
Talking Mirror
पलक जी, यह देखना ही अपने आप में बड़ी बात है, बच्चों को मजबूरी का नाम देकर सत्रों से दूरी को जायज ठहराना कितना आसान होता है, यह ज्यादातर लोग देख ही नहीं पाते। लेकिन ध्यान दें, दुर्गाबाई के सामने भी बाल विवाह एक दी हुई सच्चाई थी, फिर भी उन्होंने उसी के भीतर रास्ता निकाला, उसे हटाकर नहीं। बच्चे रास्ता बंद नहीं करते, यह सोच बंद करती है कि उनके साथ रहते हुए सत्रों तक पहुंचना संभव नहीं। आज ही देखिए कि बच्चों के होते हुए भी किसी एक सत्र या रेकॉर्डिंग तक कैसे लौटा जा सकता है। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401


















