Parulअपने ही बनाए हुए संसार को चुनना नहीं चाहती।
लेकिन उससे बड़ा सच ये है कि इस संसार को ना चुनने की कीमत चुकाने से पीछे हटती हू, डर जाती हू…
Parul जी, आपने जो आख़िरी सिरा लिखा है, कि चाहूँ या ना चाहूँ, चुन तो वही संसार रही हूँ, वही असली बात है। "नहीं चुनना चाहती" वाली बात में चुनाव कहीं है ही नहीं, वह सिर्फ़ चाहत है, और चाहत की कोई कीमत नहीं लगती। इसीलिए वह इतनी आसानी से कही जा सकती है और रोज़ की ज़िंदगी में कुछ नहीं बदलती। जो आपके नाम का फ़ैसला होता है, वह उस दिन होता है जब कीमत सामने रखी होती है और हाथ पीछे खिंच जाता है। उस वक़्त जो खिंचता है, वह कौन है? डर तो ख़ुद कुछ नहीं चुनता, डर के पीछे वही बैठा है जिसे अपना बना-बनाया घर खोना मंज़ूर नहीं। और जब तक यह चुनाव कल पर टलता है, घर रोज़ थोड़ा और पक्का होता जाता है। आचार्य जी के सत्रों में बैठना इसी कीमत को सामने रखकर देखने का सबसे सीधा तरीका है, इसलिए अगले सत्र से शुरू कीजिए। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















