
Prity Singh
इन आँकड़ों को देखकर स्पष्ट होता है कि आज की पीढ़ी अंधविश्वास से बाहर निकलने के बजाय उसे तकनीक और बाज़ार के माध्यम से और अधिक सशक्त बना रही है। जहाँ पहले विश्वास परंपरा से आता था, वहीं आज वह एल्गोरिदम, ऐप्स और उपभोक्ता संस्कृति द्वारा संचालित है। यह प्रवृत्ति इसलिए चिंताजनक है क्योंकि निर्णय-क्षमता, वैज्ञानिक सोच और व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी धीरे-धीरे बाहरी ‘विश्वास प्रणालियों’ को सौंपी जा रही है। यदि यह रुझान यूँ ही बढ़ता रहा, तो समाज भावनात्मक सहारे के नाम पर विवेक और तर्क से और दूर होता जाएगा।


















