
मैं भी आज तक ऐसे ही जीती आई हूं मैं कौन हूं ?इसका निर्धारण होता है मेरे रिश्तों और घरेलू कार्यों में इनके अलावा मेरे पास ऐसा कुछ नहीं जो स्वयं का हो। पहले बहुत बार ऐसा होता था कि मैं अपने पारिवारिक सदस्यों से इतनी ज्यादा attach हो जाती थी कि उनके फिर जाने, अलग होने के बाद बहुत तकलीफ होती थी और ऐसे लगता था जैसे अब जीवन निरस हो गया है। मैं दूसरों के लिए अपने ही हित को त्याग कर अच्छाई की मूर्ति बनी फिरती थी।इसी अच्छाई की वजह से मैं उससे पीछे छूट गई जो मैं भीतर से थी। मेरी इस पहचान को जब मुझसे दूर किया जाता तो मैं टूट जाती जैसे मैं इन सब के बिना कुछ नहीं। जिस मैं को वास्तव में जानकर, समझकर मिटाना है वह अब धीरे-धीरे में आचार्य जी से सीखने लगी हूं कि" मैं को मिटाना" जो बन बैठी हूं उसी को जानना यही है वास्तविक जीवन। कौन जो हर वक्त सहारा ढूंढता रहता है? जो दूसरों को देखते ही उनसे चिपकने भी लगता है? मेरा अपनो के प्रति लगाव हीमेरी कमजोरी है। इस कमजोरी को आत्मज्ञान और आत्म अवलोकन से हटाना और खुद में कुछ ऐसा विकसित करना जो बिना सहारे के भी मजबूती से टिका रहे, खेलना,पढ़ना , सीखते रहना गीता सत्रों से जुड़े रहना, जीवन को साहस से भर देना और जब स्वयं में उच्चतम के प्रति प्रेम पैदा हुआ है तो तो दूसरों को भी इस प्रेम में डुबकी लगाने के लिए प्रेरित प्रयास करना इसी में मौज है।🙂↔️🪴 पहले में जीवन में नए अनुभव के लिए से दूर भागती रहती थी लेकिन जब से सत्रों से जुड़ी हूं तो मैं एक चीज अपने जीवन में देखती हूं कि मैं अब उनसे भगती नहीं बल्कि अपने डर परखने के लिए निकट जाती हूं, देखती हूं ,सवाल करती हूं फिर भ्रमटूटे जाता है "मेरा डर" नहीं रहता एक नई सीख मिलती है, हिम्मत मिलती है। ☘️बहुत-बहुत धन्यवाद आचार्य जी 🪔♥️






























