
यह मेरा पहला ऑफलाइन सत्र रहा कई सालों से मेरी तमन्ना थी कि मैं आचार्य जी को सामने से देखूं जब पता चला कि आचार्य जी लखनऊ आ रहे हैं तो एक अजीब सी खुशी वाली बेचैनी हुई यकीन नहीं हुआ कि मैं उन्हें सामने देखूंगी. आचार्य जी को देखने की लालसा ने मुझे सत्र में काफी टाइम पहले ही पहुंचा दिया, काफी इंतजार करने के बाद आचार्य जी आए और तालियों की गड़गड़ाहट शुरू हो गई मैं बयां भी नहीं कर पा रही कि मैं कितनी खुशी महसूस कर रही थी मन को शांति का अनुभव हुआ। बार बार अफसोस हो रहा था कि उन्हें दूर से देख प रही हूं अच्छे से और सामने से न देख पाने का गम रहा, फिर उनकी आवाज कानों पे पड़ी जैसे मंत्र मुग्ध हो गई, टाइम बीता जा रहा था और फिर नजरे घड़ी की तरफ जमने लगी, कोई था जिसे देरी का जवाब देना था, आजाद होकर भी आजाद नहीं थे, दिल तो था यहां से जाऊं हीं न पर बंधन कुछ और कह रहा था, ना चाहते हुए भी सोच रही थी सत्र जल्दी खत्म हो, अपनी समय सीमा से 2 घंटे अधिक ही रुक पाई और फिर वही हुआ जिसका डर था, प्रश्नोत्तरी चल रही थी, और मुझे जाना पड़ा, न मेरा न.आया ना ही उनसे मिल पाई, बहुत एक्साइटेड थी कि उनसे मिलूंगी पर दुखी हो कर लौट आई। मन को सांत्वना देते हुए कि फिर कभी, पता था ये फिर कभी बहुत लंबा होगा पर फिर भी फिर कभी🙏🏻🙏🏻


















