
💬 हमारी ज़िंदगी में कहाँ-कहाँ अपनी सुविधा को ही पूरी सच्चाई मान लेना हमें उन परिणामों से दूर रखता है, जिन्हें देखना हमारे लिए असुविधाजनक है। ...🔍सबसे पहली बात जैसे कि मुझे पढ़ना पसंद है और नयी नई जानकारी हासिल करना फिर उनमें भी सवाल जवाब ढूंढना , 🧐🧐लेकिन मैने खुद की भीतर ये पाया है जब कोई भी कहानी या📚📝 उपन्यास या कविता📖 पढ़ने के बात उसपर विचार विमर्श या अवलोकन🔍🧐 का नंबर आया है तो मैं उस रस्ते पर मुश्किल से 10 से 20 कदम चल पाती हूं और फिर ऐसा लगता है अब मुझे सो जाना चाहिए बस । ठीक उसी तरह जब मैं कोई कविता लिखना चाहती📝✍️ हूं तो बड़ी मुश्किल से ही उसे पूरी कर पाती हूं 1 से 2 दिन में। ऊपर से उस कविता में कई बार संशोधन भी करना पड़ता है ,✍️☘️तब जाकर एक 8 से 10 पंक्ति की कविता लिख पाती हूं । अब उसके बाद फिर जब भी दुबारा कविता लिखने बैठती हूं तो मन करता है सो जाऊं । हालांकि मै सोती तो नहीं लेकिन वो कविता पूरी भी नहीं कर पाती । ऐसा लगता है जैसे मै खुली आंखों से सो गई। पता नहीं क्यों ? शायद इसमें भी "मै" न कुछ लिखने पढ़ने की सुविधा पकड़ लेता है।🫠🫠


















