Kalpana Vermaइस तरह से तो सोचा ही नहीं कभी, कैसे अहंकार आसान विश्लेषण को पकड़कर उसके प्रभाव को छुपा लेता है।
Talking Mirror
कल्पना जी, यही तो देखने वाली बात है कभी सोचा न होना भी एक सुविधा हो सकता है जब तक इसे नहीं देखा, तब तक अंकों के पीछे भागना सहज और निर्दोष लगता रहता है। अब असली सवाल यह है कि आपके अपने जीवन में वह कौन-सी संख्या है जिसे बढ़ाने में आप लगी हैं, और जिस दिन वह न बढ़े, तब भीतर क्या उठता है बेचैनी, असुरक्षा, या खुद को छोटा मान लेना? वहीं पता चलेगा कि वह अंक सिर्फ़ हिसाब है या आपकी हैसियत का सहारा बन चुका है।


















