Kavita Rani Main life me kuch bhi karne se pehle bahot sochti hu, confuse bhi hoti hu. Par uss time jalbaji karne ke bajaye thoda ruk jati hu. Par …
Talking Mirror
कविता जी, यहाँ फ़र्क़ को साफ़ देखिए। गधे की दिक़्क़त रुकना नहीं थी, दिक़्क़त यह थी कि उसे पता ही नहीं था वह असल में चाहता क्या है, इसलिए दोनों ढेर बराबर लगते रहे और समय बर्बाद होता रहा। आप जब रुकती हैं तो वह ख़ाली उलझन नहीं, बल्कि देखना है कि निर्णय में क्या ज़रूरी है। और नतीजा भी बता रहा है कि वह रुकना काम कर रहा है। असली सवाल यह नहीं कि कितनी देर रुकना है, बल्कि यह कि रुकते समय भीतर स्पष्टता खोजी जा रही है या सिर्फ़ डर को टाला जा रहा है। आपके अनुभव में यह स्पष्टता की तलाश ज़्यादा दिखती है, जो ठीक दिशा है। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















