Ashwani Kumar Pandeyमैं अभी भी ज़्यादातर जगहों पर दूसरों की हाँ में हाँ मिला देता हूँ। अभी वो साहस आना बाकी है जिससे मैं अपना अलग मत रख सकूँ। इसका कारण मैं…
अश्विनी जी, आपने जो लिखा उसमें एक बात साफ़ है, मक्कारी शब्द आपने खुद चुना है, किसी ने थोपा नहीं। यह ईमानदारी छोटी बात नहीं है, मगर ध्यान दीजिए इसके ठीक बाद क्या हो रहा है। जिस साहस की कमी आप बता रहे हैं, उसी के बारे में आप एक बहुत साफ़, बहुत पक्का फैसला सुना रहे हैं, कि कारण मैं हूँ, हालत यही रहनी थी। यह लगभग वैसा ही है जैसे जूरी वाले कमरे में कोई तुरंत मान ले कि केस बंद है, आगे देखने की ज़रूरत नहीं। जिस मक्कारी को आपने पकड़ा है, वह सुनने में हुई मक्कारी थी। अभी यही मक्कारी खुद को जाँचने में न घुस आए, इस पर नज़र रखिए। सुनना फिर से शुरू करने का यही सही समय है, टालने का नहीं। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401


















