Anu balaदिमाग हमेशा कुछ न कुछ सोचता रहता है और डरा रहता है जिसका असर शरीर पर भी पड़ रहा हैं।
जिंदगी में कोई मकसद नहीं है जिसके लिए जिया जाए और …
अनु बाला जी, आपने ही लिखा कि कुछ हो जाए तो दिमाग उसे बार बार दोहराता है। ज़रा देखिए, वो दोहराना किसी काम का नहीं होता, वो बस एक ही घटना को मन में फिर से जीने जैसा होता है, जैसे कोई पुरानी फिल्म को बार बार चला रहा हो, यह सोचकर कि इस बार अंत बदल जाएगा। और सुबह उठकर क्या करूंगी, यह सवाल भी उसी तरह का है, भविष्य की कोई घटना अभी घटी नहीं, फिर भी मन उसे पहले से जी रहा है, डर के साथ। घर में कैद होने की बेचैनी असली है, पर उसके पीछे जो सोच चल रही है, वो कैद से ज़्यादा ताकतवर कुछ नहीं कर रही, वो बस उसी कैद को दिन भर मन में ढो रही है। यह चक्र खुद को सोचने से नहीं टूटता, आचार्य जी के सत्र और यहाँ के सत्संग इसी तरह के मन को ठहरकर देखने में मदद करते हैं। वहाँ से शुरुआत कीजिए। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















