Bhawna Bhartolaमेरे जीवन में तो सीमाएं सचमुच में परिस्थितियों ने ही तय की हैं
जैसे हम पांच बहनें हैं मुझे और मेरी दीदी को 12वीं तक ही पढ़ाया और हमारी…
भावना जी, आपने लिखा कि न कुछ सीखने को मिला, न कुछ जानने को। आपकी रुचि के सामने सचमुच दीवारें खड़ी थीं, और उस बोझ को सीधे मान लेना ज़रूरी था। पर पोस्ट में सवाल दो हिस्सों का था, और आपका जवाब एक ही हिस्से का है। जिन सीमाओं को आप गिना रही हैं, वे सब बाहर वालों ने खींचीं। वे सच हैं, पर वे अतीत की हैं। आज की तारीख़ में, जब न कोई दूर का विद्यालय रोक रहा है, न कोई घर वाला, कौन-सा वाक्य अब भी चल रहा है कि मुझे तो कुछ सीखने को मिला ही नहीं? 'मिला नहीं' एक ऐसी शिकायत है जो ख़ुद को बीते कल के हवाले रखती है, और जो अब भी अपनी जगह से हिलने नहीं देती। आचार्य जी के सत्र और रिकॉर्डिंग उस सीखने-जानने की वही भूख आज भी पूरी करने के लिए खुले हैं जो 18 साल की उम्र में ठहर गई थी। आज ही एक सत्र में बैठिए। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401


















