MAHUYA BAURIआचार्य जी से जुड़ने से पहले आप 'जीवनमुक्ति' से जुड़ी किन मान्यताओं को समर्थन करते थे? और आपके आसपास तथा सोशल मीडिया पर इनसे जुड़ी कौन स…
Talking Mirror
महुया जी, आप यह कह रही हैं कि पहले भगवान में आस्था थी, पूजा-पाठ होता था, पर जीवनमुक्ति जैसी कोई समझ नहीं थी, और अब गीता के साथ रहते हुए यह दिख रहा है कि जीवनमुक्ति अहंकार का क्षीण होना है। यहीं पर ठहरिए — सिर्फ यह वाक्य दोहराने से बात नहीं बनेगी। पूजा करने वाला 'मैं' कौन है, वह आज किन चीज़ों से अपनी पहचान बनाता है, वह कहाँ-कहाँ अब भी कुछ माँग रहा है भगवान से, इसको रोज़ देखना पड़ेगा। ज्ञान तब तक जानकारी ही है जब तक वह उसे देखने वाले को भीतर से हिलाए। गीता के साथ जो यह समय बीत रहा है, उसको यूँ ही बहने दीजिए — यह चलते रहना ही असली उत्तर बनेगा, शब्दों से ज़्यादा।


















