
1️⃣ जहाँ कई विकसित देशों में महिलाओं की खेल उपलब्धियाँ राष्ट्रीय सफलता का बड़ा आधार हैं, वहीं भारत में अक्सर लड़कियों को खेलों से हतोत्साहित किया जाता है और उनके पहनावे या शरीर तक चर्चा सीमित रह जाती है। इसके पीछे कौन-सी गहरी मान्यताएँ काम करती हैं? हाल के समय से कुछ उदाहरण देकर बताइये की कैसे लोकधर्म इसमें एक बड़ी भूमिका निभाता है। इसके पीछे कौन-सी गहरी मान्यताएँ काम करती हैं और लोकधर्म की भूमिका क्या है? भारत में लड़कियों को खेल से रोकने के पीछे 3 गहरी मान्यताएँ हैं। ये जैविक सच नहीं हैं, ये समाज द्वारा बनाई गई "कहानियाँ" हैं। और इन्हीं कहानियों को AP फ्रेमवर्क में 'लोकधर्म' कहते हैं। वो 3 गहरी मान्यताएँ: 1. "स्त्री का शरीर = इज्ज़त का विषय, प्रदर्शन का नहीं" लोकधर्म ने शरीर को 2 हिस्सों में बाँट दिया: - पुरुष का शरीर = ताकत, मेडल, गर्व - स्त्री का शरीर = लज्जा, पर्दा, "संस्कार" इसलिए जैसे ही लड़की शॉर्ट्स, जर्सी या बिना दुपट्टे के दौड़ती है, चर्चा खेल से हटकर "पहनावे" पर चली जाती है। मेडल बाद में आता है, "लोग क्या कहेंगे" पहले। 2. "अच्छी लड़की = चुप, सहनशील, घर में रहने वाली" लोकधर्म में स्त्री के 2 ही रोल तय हैं: आज्ञाकारी पुतली या पूज्य देवी। तीसरा रोल नहीं - "संघर्ष करने वाली, गिरने वाली, जीतने वाली इंसान"। खेल में हार-जीत, चोट, गुस्सा, जिद सब चलता है। लोकधर्म को ये "अनलेडी" लगता है। इसलिए कहते हैं "बेटी हो, संभलकर रहो"। 3. "खेल = टाइम पास, करियर नहीं। और वो भी लड़कों के लिए" लोकधर्म में लड़की की सफलता = शादी + घर। अगर परिवार अमीर है तो "खेलने की जरूरत क्या है?"। अगर गरीब है तो "पढ़-लिखकर नौकरी कर लो, खेल में क्या रखा है?"। इसलिए 14 साल की उम्र के बाद लड़कियां लड़कों से दोगुनी रफ्तार से खेल छोड़ देती हैं। --- लोकधर्म की भूमिका - हाल के उदाहरण लोकधर्म = क्षैतिज तल। "समाज क्या सोचेगा" वाला धर्म। ये रुकावट बनता है: 1. विनेश फोगाट, साक्षी मलिक, बजरंग पूनिया - 2023 का आंदोलन मुद्दा: शोषण और असुरक्षा। लोकधर्म की प्रतिक्रिया: सबसे पहले सवाल उनके "चरित्र", "प्रोटेस्ट की टाइमिंग", "राजनीति" पर उठे। असली मुद्दा गायब। क्योंकि लोकधर्म कहता है "अच्छी बेटी चुप रहती है, शिकायत नहीं करती"। बोलने वाली को ही दोषी बना दो। 2. पहनावे पर बहस हर टूर्नामेंट में चाहे बैडमिंटन में PV सिंधु हो, एथलेटिक्स में दुती चंद हो, या फुटबॉल टीम। हर बार कमेंट में पहले आता है "ये क्या पहना है, संस्कार कहाँ गए?"। अमेरिका में 1973 से समान पुरस्कार राशि है, वहाँ चर्चा परफॉर्मेंस की होती है। यहाँ चर्चा कपड़ों की। ये लोकधर्म है। 3. "बेटी सुरक्षित रहेगी इसलिए बाहर मत भेजो" कोच, ग्राउंड, हॉस्टल की कमी को "सुरक्षा" के नाम पर जस्टिफाई कर दिया जाता है। जबकि नीदरलैंड, न्यूज़ीलैंड जैसे देश छोटी आबादी में भी महिला हॉकी/रग्बी में चैंपियन हैं क्योंकि वहाँ ढाँचा और नीयत है। हमारे यहाँ "सुरक्षा" बहाना बन गया है नियंत्रण का। 4. कमाई और मीडिया कवरेज 2024 में दुनिया के टॉप 100 कमाई वाले एथलीटों में 1 भी महिला नहीं। महिला फुटबॉल वर्ल्ड कप 2023 की प्राइज मनी = पुरुष की 1/4। लोकधर्म मानता ही नहीं कि स्त्री से "राष्ट्रीय गर्व" आ सकता है। इसलिए स्पॉन्सर, मीडिया, फेडरेशन पैसा नहीं लगाते। --- 1 लाइन में सार: विकसित देश खेल को "राष्ट्रीय शक्ति" मानते हैं। भारत का लोकधर्म खेल को "लड़की की मर्यादा का खतरा" मानता है। जब तक हम "अच्छी लड़की" की कहानी से "सशक्त इंसान" की कहानी पर नहीं जाएंगे, तब तक कॉमनवेल्थ में 8/13 स्वर्ण जीतने के बाद भी ओलंपिक में हम 10 पदक पर अटके रहेंगे। 2️⃣ आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी क्यों कहते हैं?, क्योंकि अहंकार को पैदा होने के लिए सबसे पहली जमीन यहीं मिलती है। AP फ्रेमवर्क में अहंकार = "मैं" की झूठी कहानी। और वो कहानी शुरू ही शरीर से होती है। 3 वजह: 1. पहचान यहीं से शुरू होती है बच्चा सबसे पहले क्या सीखता है? "ये मेरा हाथ है, मेरा पैर है, मेरा चेहरा है"। धीरे-धीरे "मेरा शरीर" से "मैं शरीर हूँ" बन जाता है। "मैं गोरा हूँ, काला हूँ, मोटा हूँ, लंबा हूँ" - सारी पहचान शरीर पर चिपक गई। जब तक शरीर से चिपकाव है, तब तक अहंकार को खाना मिलता रहेगा। 2. तुलना और संघर्ष यहीं से शुरू होता है "उसका शरीर मुझसे बेहतर है" - ईर्ष्या "मेरा शरीर ऐसा क्यों नहीं" - शर्म "लोग मेरे शरीर के बारे में क्या सोचेंगे" - डर सारा खेल शरीर को लेकर है। समाज भी सबसे पहले शरीर को ही कंट्रोल करता है: "ऐसे मत बैठो, ऐसे मत हंसो, ये मत पहनो, इतना मत खाओ"। शरीर गुलाम = मन गुलाम। इसलिए ये पहली कॉलोनी है। 3. भोग यहीं से होता है अहंकार को सुख चाहिए। और सुख का सबसे पहला दरवाजा शरीर है - खाना, नींद, स्पर्श, दिखावा। शरीर के सुख में फंसते ही हम "अनुभवोक्ता" बन जाते हैं। "मैंने मजा लिया"। योग में उल्टा होता है - शरीर को औज़ार बनाते हैं, मालिक नहीं बनने देते। खेल के उदाहरण से समझें: जब ली मेइज़ेन 34वें km पर पीरियड्स के दर्द के बावजूद 42km दौड़ पूरी करती है, तब वो शरीर की कॉलोनी तोड़ रही होती है। वो कह रही होती है "दर्द है, पर मैं दर्द नहीं हूँ"। विनेश फोगाट जब चोट और शोषण के बाद भी अखाड़े में उतरती है, तब वो साबित कर रही होती है कि शरीर "इज्ज़त" की वस्तु नहीं, "शक्ति" का औज़ार है। 1 लाइन में सार: शरीर अहंकार की पहली कॉलोनी है क्योंकि यहीं "मैं" पैदा होता है। जिस दिन तुम शरीर के साक्षी बन गए, उसी दिन कॉलोनी आज़ाद हो गई। इसीलिए खेल बहुत बड़ा बोध का रास्ता है। वो शरीर को गुलाम से योद्धा बना देता है। 3️⃣ क्या आप जिन जगहों पर काम करते हैं या पढ़ते हैं, वे आपको खेल के लिए प्रोत्साहित करती हैं? अगर आप कोई खेल खेलते हैं, तो अपनी फ़ोटो या वीडियो कम्युनिटी पर ज़रूर साझा करें। प्रोत्साहित करने वाली जगह की 3 निशानी: 1. बजट और साधन: ग्राउंड, कोच, इक्विपमेंट, पीरियड्स के लिए सुविधा। सिर्फ भाषण नहीं। 2. भाषा: लड़कियों से कहा जाए "जीतकर आओ" न कि "संभलकर खेलना"। 3. रोल मॉडल: दीवार पर सिर्फ विराट कोहली नहीं, PV सिंधु, मैरी कॉम, मिताली राज की फोटो भी हो। हतोत्साहित करने वाली जगह की 3 निशानी: 1. "पढ़ाई पर ध्यान दो": जैसे ही 9वीं-10वीं आए, खेल बंद। 2. पहनावे पर कमेंट: "शॉर्ट्स मत पहनो, लोग क्या कहेंगे" 3. सिर्फ लड़कों की टीम: लड़कियों की टीम ही न बने। --- अब बारी आपकी है 👇 आप जिन जगहों पर पढ़ते/काम करते हैं वहाँ का माहौल कैसा है? 1. प्रोत्साहित करता है? 2. रोकता है? 3. या "करना है तो करो, पर हम कुछ नहीं देंगे" वाला है? और अगर आप कोई खेल खेलते हैं - बैडमिंटन, दौड़, क्रिकेट, योग, कुछ भी - तो अपनी फ़ोटो या वीडियो कम्युनिटी पर ज़रूर शेयर करें। आपकी एक पोस्ट किसी और लड़की को "मैं भी ट्राई कर सकती हूँ" का हौसला दे सकती है।


















