
❓ आप बताइए, आपने किसको दगा दिया है? किसे अपनी सुविधा, सुरक्षा या व्यक्तिगत शांति के लिए अकेला छोड़ दिया? 👉हाँ मैं दगाबाज हूँ, क्युकी मैं अभी भी अपनी सुरक्षा और सुविधा और व्यक्तिगत शांति के लिए, बाहर नही निकल पा रहीं। मुझे पता नही क्या समझ नही आता। विचार करकें आगे के परिणाम की और भगति हूँ।और खुद ही उस काम को करने से पहले परिणाम निकल लेती हूँ। ऐसे करकर मे एक सुरक्षा का दायरा तैयार कर रहीं हूँ।और जानते हुए, भी अनजान बनती हूँ। खुद के प्रति, ऐसे दिखाती हूँ, की मुझे तो अपना कुछ नही पता, की क्या बचा रहीं हूँ। 👉मेने अपने स्वार्थ के लिए, कभी किसीको नही छोड़ा, बल्कि मुझे ऐसे परिस्थिति का सामना करना पड़ा है, और दुख भी हुआ, बहूत और बाहर- बाहर ऐसे दिखा रहीं थीं। की मुझे कुछ नही चाहिए, बदले मे यही बोलके,उम्मीद को पैदा कर रहीं थीं। क्युकी ऐसे मेने देखा नही है, की बिना उम्मीद के कोई कुछ करता भी है, और उन्ही कोई एक मैं हूँ।और मेने पहले मे किसीको साथ की जरूरत पड़ी है, तो मददत जरूर की है। भले ही मुझे कुछ भी सहना पड़ा हो, और जहाँ सही लगा वहा के लिए कभी पीछे नही हटी। और संस्था की सदस्य इसी कारण से बनी की, मुझे बता नही। सब मेरे साथ ही क्यू दोखा करते है, मुझे उस वक़्त कुछ नही पता था। और वजह बाहर खोजती थीं, खुद को बचा ले जाती थीं, और भोज बढ़ता रहता था। पर अब हल्के होने की राह मुझे मिली। पर मैं आचार्य जी के काम को उन्ही का समझती हूँ, और सच बताऊ तो मेने कभी उनके काम को समझा नही, बाहर - बाहर दिखाती की उनके लिए लड़ सकती हूँ, फिर कोई कुछ गलत आलोचना करता तो, मुझे उन्ही पर सक होता था। की कही ये भी बाकि सब जैसे हो। लोगो की बातो का असर होता है, ज़ब आचार्य जी से दूर जाय तब।और मेरे मन मे भी आचार्य जी को लेकर संस्य बने रहने का कारण,ये है, की कभी भी छोड़ दू। अहम का सरक्षण चुनना चाहती थीं, क्युकी जों भी धारणा, और अच्छाई का प्रतीक मेने अपने बना रखे थे, वो टूटते है। तो तखलीफ होती है।पर मैं नही छोड़ने वाली। मुझे खुद पर यकीन जानने के प्रति। जिस राह पर इतना चल सकती हूँ। वहा मुझे दूसरा नही हटा सकता, मेरे चुनाव के बिना।


















