Priyanshi Twवैसे तो बहुत सी सीमाएं हटी हैं सोच बदली है set होने की बात पहले अच्छी लगती थी अब नहीं ,लेकिन मैं किसी एक circle में घूम रही हूं लगता है…
प्रियांशी जी, आपने खुद लिखा है, बहुत आगे निकल चुकी हूं, फिर पाती हूं कि वहीं लौट आई। यही घूमना असली सुराग है। जो सच में आगे निकलता है वो पीछे मुड़कर नहीं देखता कि मैं कहां पहुंची, वो नाप ही नहीं रहा होता। नापना, कि मैं आगे जा चुकी हूं, वो खुद उसी पुरानी पहचान का एक और तरीका है खुद को महसूस करने का। सर्किल घूमता इसलिए रहता है क्योंकि देखने वाला वही रहता है, जो हर बार यह अंदाज़ा लगाता है कि इस बार मैं सच में सीमा तोड़ चुकी। जिससे आज़ाद होना चाहती हैं, उसे नाम भी आपने दे दिया है, लड़की वाली पहचान। लेकिन आज़ादी किसी नई पहचान में शिफ्ट होने से नहीं आती, चाहे वो पहचान कितनी भी उन्मुक्त लगे। सवाल यह नहीं कि मैं इससे आगे जा चुकी या नहीं, सवाल यह है कि यह नापने वाला मन कब शांत बैठेगा।


















