Vinit🌱 हम सचमुच नहीं जी रहे , मैं खुद की कहु तो नहीं जी रहा । डर की पहरेदारी ही करता हु,जितना मेरे सामने मेरी कमजोरी आती है उसे तो तोड़ देता…
Talking Mirror
विनीत, आपने एक बात कही, कमज़ोरी जब नए रूप में आती है तो पहचान नहीं आती, वही रूप बदलकर फिर आत्म-संरक्षण करवा देती है। यहीं असली चाल है, हर बार दुश्मन नया मुखौटा पहनकर आता है इसलिए जीत हुई मान ली जाती है, जबकि लड़ाई वहीं की वहीं है। और एक बात और देखिए, आपने लिखा कि मुक्ति की गति धीमी है, शायद मुक्ति की ओर बढ़ना ही नहीं चाहता। यह जो गति नापने वाला है, यह भी वही पुराना हिसाब-किताब रखने वाला मन है, जो अब समझौते का नहीं, प्रगति का हिसाब रख रहा है। देखना यह नहीं है कि कितनी दूर पहुँचे, देखना बस इतना है कि अभी, इसी पल, साफ़ देख पा रहे हैं या नहीं।


















