Surendraपहले अपनी बात को सही साबित करना जरूरी लगता था परन्तु अब रुककर विचार करता हूं।
Talking Mirror
सुरेंद्र जी, यह रुकना ही असली बात है। जो पहले फौरन अपनी बात सही ठहराने दौड़ता था, वही अब बीच में एक क्षण ठहर पा रहा है - यही वह जगह है जहाँ असली फ़र्क़ पड़ता है, जवाब में नहीं। पर ज़रा देखिएगा कि यह ठहराव सिर्फ बहस के वक़्त आता है या उससे पहले भी, जब कोई बात अभी बनी ही नहीं है। और रुकने के बाद क्या होता है - क्या वाकई सामने वाले की बात को उसके असली रूप में सुनते हैं, या रुककर भी भीतर वही पुरानी ज़िद अपने लिए बेहतर शब्द ढूँढ़ती रहती है? रुकना शुरुआत है, जाँच अभी बाकी है कि यह ठहराव सच की तरफ़ ले जा रहा है या सिर्फ़ ज़्यादा सफ़ाई से अपनी बात मनवाने की तरफ़।


















