
आपका बोधकार्य: 1️⃣ जहाँ कई विकसित देशों में महिलाओं की खेल उपलब्धियाँ राष्ट्रीय सफलता का बड़ा आधार हैं, वहीं भारत में अक्सर लड़कियों को खेलों से हतोत्साहित किया जाता है और उनके पहनावे या शरीर तक चर्चा सीमित रह जाती है। इसके पीछे कौन-सी गहरी मान्यताएँ काम करती हैं? हाल के समय से कुछ उदाहरण देकर बताइये की कैसे लोकधर्म इसमें एक बड़ी भूमिका निभाता है। ✍️ लड़कियों को खेलों से और बाहरी कामों से हतोत्साहित करना और उनके पहनावे या शरीर तक उन्हें सीमित रखने की गहरी मान्यताएं ' मनु स्मृति' के श्लोकों से आती है। यहां बहुत सारे लोग शिक्षा से वंचित रहे है और जो शिक्षित वर्ग हुए है वो कभी मूल(वेदांत) को समझने की कोशिश ही नहीं किए। वो सब- के- सब कुछ ऐसे ' शास्त्र ' है जिसे विकृत कर के लिखा गया है, अपनी सुविधा के अनुसार। हम सब उन्हीं को मानते गए और अशिक्षित वर्ग में फैलाते गए और अब यह एक गहरी बीमारी का रूप ले चुका है जो परंपरा बन कर, संस्कार बन कर हम सभी स्त्रियों के लिए सामाजिक ढांचा बनते जा रहा है। पुरुष वर्ग को इसमें फायदा दिखाता है, उन्हें ये लगता है की लड़कियों की सामाजिक आत्मनिर्भरता, आर्थिक आत्मनिर्भरता, राजनीतिक आत्मनिर्भरता उनके अहंकार को चुनौती दे सकता है! इसलिए वो नहीं चाहते ये ढांचा तीतर- बितर हो और स्वयं महिलाओं को भी उसी गुलामी/परंपरा/बीमारी/मान्यता में जीना सुविधाजनक लगता है। हाल के समय कि बात करें तो मैं कल ही स्कूल से आ रही थी तो मैंने देखा कि सड़क पर एक भीड़ लगी है। उस भीड़ में बहुत सारी महिलाएं एक साथ इकट्ठी हुई थी, काफी सजी- सवारी, पूरे बदन पर एक अलग पहनावा जो उन्हें उनके अनुसार शायद! आकर्षक बना रही थी परंतु क्या ये आकर्षण सचमुच उनकी थी? ये एक सामाजिक मान्यताओं की गहरी परंपरा थी - "मधुश्वनी" जो पीढ़ियों से ब्राह्मण परिवार में चलते आ रही है परंतु आज तक किसी महिला ने ये सवाल नहीं पूछा! ये हम क्यों करें? इसका हमारे नए जेनरेशन के लिए क्या फायदा है? क्या ये करना उचित भी है? जो हमें सीखा दिया गया उसी को बस हम दोहराना सिख गए है। इसे क्या हो रहा है -ज्ञान/कौशल से महियालयें वंचित होती जा रही है। तो लोकधर्म अपने आप नहीं आगे पढ़ता हम उसे बढ़ावा देते है। 2️⃣ आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी क्यों कहते हैं? ✍️ क्यों कि अहंकार के वजह से ही सारी कहानी/मान्यताएं/परंपराएं शुरू होती है। अहंकार को शरीर से वो सब करने के लिए मिलता है जिससे वो अपने अधूरेपन को पूरा कर सके। इसलिए अहंकार सबसे पहले अपने शरीर को ही गुलाम बनाता है। परंतु क्या ये अधूरापन पूरा हो पाएगा? इस अधूरेपन की समझ को "गीता मिशन" हम सभी तक पहुंचने का काम कर रही है । हम दिल से शुक्रिया करना चाहते है "आचार्य जी" को 🙏🙏🙏🙏... 3️⃣ क्या आप जिन जगहों पर काम करते हैं या पढ़ते हैं, वे आपको खेल के लिए प्रोत्साहित करती हैं? अगर आप कोई खेल खेलते हैं, तो अपनी फ़ोटो या वीडियो कम्युनिटी पर ज़रूर साझा करें। ✍️ मैं जिन जगहों पर रहती हूं वहां लडकियों के लिए खेल खेलना गुनाह करने के समान है। यहां तो लड़कियों के खेल में स्कूल में भी भेदभाव किया जाता है कि ये खेल लडकियों के लिए ठीक नहीं टीचर्स ही बोलते है, गांव में तो खेल को लेकर अलग ही धारणा है। लड़की है जवान हो गई, अंग विकसित हो गए और देखी कैसे उछलती है! उन्हें खुल कर जीने का जैसे अधिकार ही ना हो! वही लड़के जाते है मैदान में खेलने, जैसे खेतों में, पर! लड़की नहीं जा सकती। कोई लड़की खेलना भी चाहती है तो उन्हें अपने घर में भयानक चुनौती का सामना करना पड़ता है और आम तौर पर हमारे शिक्षा व्यवस्था में इतनी ताकत है नहीं की लड़की को को आंतरिक बल मिले। मैं कक्षा में खेल के लिए प्रेरित भी करती हूं, सड़क पर खेलती भी हूं और स्टेटस भी लगती हूं ताकि लड़कियों को इससे बल मिले और वो अपनी मानसिक बंधन को तोड़ कर आगे आए। ये वीडियो साझा कर रही हूं -



















