
💭 किसी महिला को ‘डायन’ कहना इसलिए आसान हो जाता है क्योंकि किसी अनजानी, डरावनी या दुर्भाग्यपूर्ण घटना की वास्तविक वजह खोजने से आसान है उसका एक चेहरा और एक कारण तय कर देना। बीमारी क्यों हुई, फसल क्यों खराब हुई या कोई अनहोनी क्यों हुई—इन सवालों की अनिश्चितता सहना कठिन है। लेकिन किसी एक व्यक्ति को दोषी मान लेने से मन को एक आसान उत्तर मिल जाता है। जब उस व्यक्ति के पास अपनी बात रखने की शक्ति भी कम हो, तो यह धारणा अंधविश्वास से आगे बढ़कर सामाजिक नियंत्रण और शोषण का साधन बन सकती है। लेकिन इस लेख ने मुझे इससे भी ज्यादा गहरे स्तर पर सोचने को मजबूर किया। अंधविश्वास केवल डायन, भूत या टोने-टोटके को मानना नहीं है। बिना जाँच के किसी धारणा को सत्य मान लेना भी उसी मानसिकता का सूक्ष्म रूप हो सकता है।👀 🧠कभी हम सोचते हैं—“जिसके साथ बुरा हुआ, उसने जरूर कुछ गलत किया होगा।” कभी किसी एक पुराने अनुभव को भविष्य का नियम बना लेते हैं—“मेरे साथ पहले ऐसा हुआ था, इसलिए अब भी ऐसा ही होगा।” कभी यह मान लेते हैं कि बहुत लोग किसी बात को मानते हैं तो वह सही ही होगी। और शायद सबसे गहरा रूप यह है कि जिस चीज़ का कारण हमें पता नहीं होता, वहाँ ‘मुझे नहीं पता’ कहने के बजाय हम तुरंत कोई कहानी बना लेते हैं।🕸 यहीं सवाल जब खुद पर रखती हू तो दिखता है । 👁जिस तरह किसी महिला को बिना प्रमाण ‘डायन’ बना देना गलत है, क्या मैं भी कभी बिना पर्याप्त प्रमाण किसी व्यक्ति, परिस्थिति या अपने बारे में कोई निष्कर्ष तय नहीं कर देती? क्या किसी के एक व्यवहार को देखकर मैंने उसके पूरे व्यक्तित्व की कहानी बना ली? क्या किसी घटना का कारण न समझ आने पर मैंने अपने मन को कोई सुविधाजनक कारण दे दिया? इसलिए मुझे लगता है कि अंधविश्वास का सबसे खतरनाक रूप हमेशा वह नहीं होता जिसे देखकर हम तुरंत कह दें—“यह अंधविश्वास है।” उससे सूक्ष्म वह है जिसे हम इसलिए सच मानते रहते हैं क्योंकि वह हमें सच लगता है। शायद असली आत्म-परीक्षण यह नहीं है कि “मैं कौन-कौन से अंधविश्वास मानती हूँ?” बल्कि यह है— “मेरी कौन-सी धारणाएँ ऐसी हैं जिन्हें मैंने कभी जाँचा ही नहीं?” कहाँ मैंने ‘मुझे नहीं पता’ स्वीकार करने के बजाय अपनी कहानी को सत्य बना लिया?”👀


















