ALOK VISHWAKARMAVaise to mere sath aisa tabhi hota hai jab mai paisa kahi se gira hua mila ya fir koi kharchne ke liye de tab mai sochta hu ki ye paisa…
Talking Mirror
आलोक जी, गौर करने वाली बात ये है कि गिरा हुआ पैसा भी उतना ही असली है जितना कमाया हुआ, फिर भी उसे खर्च करते वक्त हाथ नहीं कांपते क्योंकि दिमाग में एक लेबल लग चुका होता है, यह मेरा नहीं है। यानी बचत या खर्च का फैसला पैसे की वैल्यू से नहीं, उस कहानी से हो रहा है जो आपने उस नोट पर चिपका दी। सोचिए, अगर वही रकम सैलरी में मिलती, क्या तब भी उतनी आसानी से हाथ से निकल जाती।


















