
युगेश्वरी साहू
" मैं" अपनी जरूरत और इच्छाओं को इतना स्वाभाविक मान लेता है कि उसे जीव की दृष्टि से देखना ही भूल जाता है जो मैं की सुविधा की कीमत चुका रहा है। अहंकार अगर प्रत्येक जीव को सम दृष्टि से देखें तो यह जगत कितना सुंदर होगा।
Post

" मैं" अपनी जरूरत और इच्छाओं को इतना स्वाभाविक मान लेता है कि उसे जीव की दृष्टि से देखना ही भूल जाता है जो मैं की सुविधा की कीमत चुका रहा है। अहंकार अगर प्रत्येक जीव को सम दृष्टि से देखें तो यह जगत कितना सुंदर होगा।
No comments yet.