akanksha mishraअभी मैं अपने जीवन पे किसी और का ही नियंत्रण पाती हूं और मुझे ये बदलना है। हमेशा यही चलते रहता है कि बदलना है लेकिन कैसे? ये नहीं पता।
र…
अंकांक्षा जी, आपने खुद लिखा है, रात को भीतर घुसती हूं और फिर से सब कुछ blame करने में बदल जाता है। यही वो जगह है जहां देखना अटक रहा है। भीतर जाना और अपने ऊपर आ जाना, दो अलग चीजें हैं, पहला ईमानदारी है, दूसरा वही पुरानी कहानी है जो हर बार तैयार बैठी रहती है सफाई देने के लिए। जो सवाल पोस्ट में पूछा गया है वही आपकी रात की उलझन का जवाब भी है, जिस नियंत्रण को आप बाहर देख रही हैं, उसके पीछे की कोई न कोई गांठ भीतर भी बैठी होगी, और वो सामने तभी आएगी जब blame का रास्ता एक पल को बंद हो जाए। अगली बार जब नींद खुले और भीतर जाना शुरू हो, बस उस पल को देखिए जहां आप दूसरों की तरफ मुड़ने ही वाली हों, वहीं रुक कर देखिए क्या हो रहा है। सत्र सुनना शुरू करें तो यही ठहरना धीरे धीरे साफ होने लगेगा।


















