Acharya Prashant is a philosopher and author, an alumnus of IIT Delhi and IIM Ahmedabad. He is among the most widely read philosophical columnists writing in India today, with more than 190 published columns ranging across climate and consumption, elections and ideology, caste and religion, gender, education, geopolitics, technology, and the inner life.
What unifies this range is a single method: tracing every public crisis back to the unexamined self that produces it.

FOR COMMISSIONING EDITORS
In this special Janmashtami feature published in Rajasthan Patrika, philosopher and author Acharya Prashant explains why the true Krishna is not an idol to be worshipped from a distance, but Truth, the Self, and Realization (Satya, Atma, Bodh) itself.

आचार्य प्रशांत ने दैनिक जागरण में लिखा है कि जीवन में दुःख आएगा, और यह भी सत्य है कि दुःख चला जाएगा। वे कहते हैं कि जब तुम्हारे जीवन में दुःख आएगा, तो तुम्हारा रोना स्वाभाविक होगा, लेकिन जब दुःख चला जाएगा, तब भी तुम रो सकते हो। इसका मतलब यह है कि पहले आँसू दुःख के होते हैं और दूसरे आँसू दुःख से मुक्ति के होते हैं।

आचार्य प्रशांत ने राष्ट्रीय सहारा में लिखा है कि नवरात्रि का समय शक्ति की समझ के लिए उपयुक्त है। वे बताते हैं कि शिव केंद्र और शिव सत्य का मतलब है कि शिव शाश्वत सत्य और शांति का प्रतीक हैं। वहीं, शक्ति जीवन का प्रतीक है, जो जीवन को ऊर्जा और गति प्रदान करती है। आचार्य प्रशांत के अनुसार, नवरात्रि के अवसर पर हमें शक्ति की इस महत्वपूर्ण भूमिका को समझना चाहिए और इसे अपनी जीवन यात्रा में एक मार्गदर्शक के रूप में स्वीकार करना चाहिए।

आचार्य प्रशांत ने अमर उजाला के इस लेख में बताया है कि जीवन का असली संघर्ष बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि हमारे मन के विकारों से है। उन्होंने समझाया कि हमारा मानव जीवन कीमती है और इसे सही दिशा में ले जाने के लिए हमें अपने मन के विकारों को पहचानना और हटाना जरूरी है। लेख में आचार्य प्रशांत ने कहा कि हमारे मन में उठने वाले क्रोध, लालच, ईर्ष्या, और अन्य नकारात्मक भावनाओं को नियंत्रित करना असली संघर्ष है। उन्होंने जोर दिया कि आत्म-चिंतन और आत्म-साक्षात्कार के माध्यम से हम अपने भीतर के इन विकारों से मुक्ति पा सकते हैं और सच्चे अर्थों में आध्यात्मिक जीवन जी सकते हैं।

आचार्य प्रशांत बताते हैं कि हम जन्म से ही दुख में जीते हैं और इसका सही ज्ञान नहीं होता। वे कहते हैं कि अपने दर्द को समझना ही सही मार्ग दिखा सकता है। इस लेख में आत्मज्ञान, संवेदनशीलता, और मन की स्थिरता पर जोर दिया गया है। राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में, यह बताया गया है कि अगर हम अपनी स्थिति का सटीक संज्ञान लें तो हमारी भटकन समाप्त हो सकती है।

रक्षाबंधन का सही अर्थ समझाते हुए राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने कहा कि यह केवल भाई-बहन के बीच का पर्व नहीं है। विभिन्न पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में रक्षा के व्यापक अर्थ दिए गए हैं। आज हमें पर्यावरण, भाषा, संस्कृति और समाज की रक्षा की जरूरत है। यह पर्व हमें व्यापक दृष्टिकोण अपनाने और सभी कमजोर एवं जरूरतमंदों की रक्षा करने का संदेश देता है। आचार्य प्रशांत ने कहा कि हमें हर प्रकार की सुरक्षा और संरक्षण के लिए प्रयास करना चाहिए।

आचार्य प्रशांत ने यज्ञ के वास्तविक अर्थ पर चर्चा करते हुए दैनिक जागरण के इस लेख में बताया कि आज के समय में लोग यज्ञ का सही अर्थ नहीं समझते। यज्ञ का मतलब केवल पूजा-पाठ नहीं है, बल्कि यह आत्मिक और आध्यात्मिक शुद्धि का माध्यम है। यदि हम यज्ञ का सही मतलब नहीं जानते, तो इसका सही लाभ भी नहीं उठा सकते। यज्ञ के सही अर्थ को समझना और उसका पालन करना ही सच्ची भक्ति है।

आचार्य प्रशांत ने दैनिक जागरण के इस लेख में बताया कि हमारी परेशानियों का समाधान हमारे स्वयं के भीतर है। यदि हम अपनी वास्तविक समस्या को पहचानें और उसे सही तरीके से समझें, तो हम उसका सही समाधान पा सकते हैं। इधर-उधर भटकने और बाहरी उपायों पर निर्भर रहने के बजाय हमें अपने अंदर झांकने और समस्या के मूल कारण को समझने की आवश्यकता है। सच्ची शांति और समाधान तभी मिल सकता है जब हम अपनी समस्याओं का सामना ईमानदारी से करें।

आचार्य प्रशांत ने दैनिक जागरण के इस लेख में बताया कि अध्यात्म एक अंतिम बिंदु का नाम है, जो सामान्य जीवन से बहुत अलग है। यह आत्म-जागरण और सच्ची समझ की ओर ले जाता है। उन्होंने कहा कि शरीर और इस दुनिया में आना शुभ है, लेकिन असली शांति और खुशी अध्यात्म के माध्यम से ही प्राप्त होती है। अध्यात्म का अर्थ है, अपने सच्चे आत्म को जानना और अपने मूल उद्देश्य को समझना।

Acharya Prashant emphasizes that true success lies in making the right choices rather than simply achieving goals. He highlights the importance of aligning decisions with one's core self and inner needs, asserting that victory is found in the act of choosing the right path itself, rather than in the attainment of external outcomes.

Acharya Prashant emphasizes that true success lies in making the right choices rather than simply achieving goals. He highlights the importance of aligning decisions with one's core self and inner needs, asserting that victory is found in the act of choosing the right path itself, rather than in the attainment of external outcomes.

राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने धर्म-परिवर्तन पर हो रहे विवाद पर कहा कि यह आत्मिक शांति और सच्चे धर्म की खोज में होना चाहिए, न कि आर्थिक या शारीरिक लाभ के लिए। उन्होंने समझाया कि बाहरी दिखावे या लाभ के लिए धर्म बदलना आत्मिक विकास में बाधा उत्पन्न कर सकता है।

Acharya Prashant challenges the self-help illusion in The Pioneer, asserting true spirituality begins when the ego accepts it needs no aid, and transformation occurs by relinquishing ego control.

तुम्हारे शरीर पर अगर चोट लग जाए, ख़ास तौर पर यदि मस्तिष्क में कोई आकर हथौड़ा मार दे तो कहाँ गई चेतना? कहाँ गई बुद्धि? तो मनुष्य को यह समझना होगा कि है तो वह प्रकृति का ही पुत्र है। शरीर माँ है जिससे चेतना उठती है और चेतना पुरुष है—इसकी अवहेलना करके तुम कहीं पहुँच नहीं सकते, कम-से-कम तुम कोई विजय नहीं पा सकते।

अमर उजाला में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत लिखते हैं अपना भला-बुरा सोचने-समझने की शक्ति आपको धीरे-धीरे हर हालात से लड़ना सिखा देती है और इस काबिल बना देती है कि आप दूसरों की परछाई से निकलकर अपने जीवन के अहम निर्णय खुद ले सकें। खुद पर दूसरों की सोच हावी नहीं होने दें और अपनी विचारधारा को स्पष्ट रखें। आलोचनाओं से प्रभावित हुए बिना अपने उद्देश्य की ओर आगे बढ़ें। अपनी ताकत और कमजोरियों को पहचानकर जीवन में आत्मनिर्भर बनें। आत्मनिर्भरता ही आपकी सच्ची शक्ति है।

आचार्य प्रशांत द्वारा लोकदेश में लिखा यह लेख शिवलिंग की पूजा के पीछे के आध्यात्मिक महत्व को स्पष्ट करता है। शिवलिंग चेतना का प्रतीक है। वे बताते हैं कि शिवलिंग की पूजा न केवल पौराणिक कथाओं में बल्कि हमारे जीवन के विभिन्न पहलुओं में भी गहरी अर्थवत्ता रखती है। शिवलिंग को चेतना और सृजनात्मक शक्ति के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।

राष्ट्रीय हिंदी मेल के इस लेख में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि हमें सबसे कठिन काम को प्राथमिकता देनी चाहिए। कठिनाइयों का सामना करने से आत्म-विकास और दृढ़ता का निर्माण होता है। समस्याओं से निपटते समय हमें धैर्य, आत्म-संयम, और निरंतर प्रयास की आवश्यकता होती है। इस प्रक्रिया में अन्य कार्य भी सहजता से पूर्ण हो जाते हैं।

Delve into Acharya Prashant's illuminating perspective on consumption and inner peace in The Pioneer. As a renowned Vedanta teacher, he advocates for mindful consumption, urging readers to align their consumption habits with personal well-being and environmental sustainability.