Acharya Prashant is a philosopher and author, an alumnus of IIT Delhi and IIM Ahmedabad. He is among the most widely read philosophical columnists writing in India today, with more than 190 published columns ranging across climate and consumption, elections and ideology, caste and religion, gender, education, geopolitics, technology, and the inner life.
What unifies this range is a single method: tracing every public crisis back to the unexamined self that produces it.

FOR COMMISSIONING EDITORS
In this special Janmashtami feature published in Rajasthan Patrika, philosopher and author Acharya Prashant explains why the true Krishna is not an idol to be worshipped from a distance, but Truth, the Self, and Realization (Satya, Atma, Bodh) itself.

"कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए आखिर चाहिए क्या? सैद्धांतिक रूप से, कुछ भी नया नहीं। किसी आविष्कार का इंतज़ार नहीं है। किसी लॉन्च विंडो की प्रतीक्षा नहीं करनी है। मटेरियल विज्ञान में किसी बड़ी सफलता की आवश्यकता नहीं है। ज़रूरत बस इतनी है कि एक बहुत बड़ी आबादी अपनी मौजूदा भोग-वृत्ति पर लगाम लगाए। और यही वह चीज़ है जिसे कोई भी इंजीनियर पूरा नहीं कर सकता, और कोई भी शिखर सम्मेलन इस पर बातचीत नहीं कर सकता।"

"Janmashtami carries two Krishnas. One is the fashioned Krishna: the butter-thief on his swing, dancing among the gopis, easy to remember because he asks nothing of you. The other is the Krishna of the Gita, dangerous, asking for everything. Janmashtami remembers the first and forgets the second. Why? Because remembering the second costs something, and the whole art of the ego is to avoid that cost."

“There is one Krishna that we have fabricated for ourselves: the butter-thief, sitting on a swing, reveling in Raas with the Gopis. It’s easy to remember this Krishna, because he doesn’t demand anything from us. On the other hand, there is the Krishna of the Gita. In his life you will see nothing but apparent contradictions, because advaita itself means that all dualities are contained within it. The otherworldly image of Krishna that we created has, in fact, taken the Gita away from us.”

In this special Janmashtami feature published in Rajasthan Patrika, philosopher and author Acharya Prashant explains why the true Krishna is not an idol to be worshipped from a distance, but Truth, the Self, and Realization (Satya, Atma, Bodh) itself.

"Everything is being blamed—the bad luck, the missing pilgrims, the sheer scale of the water. But the one word that should not merely be spoken but shouted aloud—climate—is being deliberately avoided. What kind of conspiracy is this? And who is it designed to deceive?"

“What is being called a generational shift is actually a fleeting, circumstantial phenomenon, and everyone has misunderstood it—whether they are celebrating it or panicking over it, including political parties. This badge of honour is being bestowed far too quickly. We say they are rebels. But are they really?”

"Freedom is natural — it's a given. The more honest and more useful question is: if everything is free from birth, then where did this thing called slavery come from later on? Was India always enslaved? No. So where did slavery come from? That's the question we should really be asking."

"The violence committed three times a day, with every meal, throughout a lifetime, is no longer called cruelty—it becomes unconsciousness. One who refuses to look at what's on their plate eventually loses the ability to truly see the rest of their life as well. That blindness begins spreading long before they become aware of it."

“The chair has never corrupted a truly sacred person. The chair only gives a bigger stage to that ego whose owner has never bothered to question it. You can keep changing the patients as many times as you like; the disease remains in the hospital.”

"If there were genuine love for cleanliness, filth would not merely be hidden - it would be eliminated. Instead of relocating slaughterhouses, they would be shut down. Industrial demand would be reduced, not simply shifted elsewhere. Every system bears witness to the same fact: what is called love is, as yet, only an act. True cleanliness, then, has only one meaning - the diminishing of the ego."

Every year Holi comes, every year Holika is burned, And every year, colors fill the air, friends meet, and there is joy. All this is fine, all this should happen. But along with all this, something else also happens that should not happen

True victory is not over the opponent, but over one's own shackles: personal, cultural, historical. When women play freely, the nation breathes freely. When women dance fearlessly, life on earth finds shelter.

Freedom is not a gift, but an achievement that each individual must earn. Political independence can be inherited, but mental freedom and freedom from the false self require constant effort.

Raksha Bandhan can be a reminder to collectively safeguard the Discretion and Compassion that give life its true meaning. Let this festival transcend the mere exchange of gifts and become an Intent—where we protect each other’s Sovereignty and the dissolution of the false.

Guru Purnima is not a celebration of any individual or tradition. It is a tribute to the one who gave us the vision to see, and left us when we learned to see. It is a tribute to the word that taught us to love the truth. The one who came close so that we could learn to walk alone without bowing.

इस लेख में आचार्य प्रशांत ने पत्रिका में व्यक्त किया है कि दूसरों के खिलाफ जाना आसान होता है, क्योंकि हम उनके गुण और कमज़ोरियों को आसानी से देख सकते हैं। लेकिन अपने खिलाफ जाना मुश्किल होता है, क्योंकि इसमें हमें अपने दोषों को स्वीकार करने की जरूरत होती है। उन्होंने यह भी समझाया है कि अध्यात्मिक राह पर चलना भी इसी तरह का सफर है, जिसमें हमें अपने अंदर की गहराईयों को समझने और स्वीकार करने के लिए मेहनत की आवश्यकता होती है।

इस लेख में आचार्य प्रशांत ने दैनिक जागरण में तुलसीदास के राम के गहरे अर्थ और उनकी व्याख्या पर प्रकाश डाला है। उन्होंने बताया है कि राम न केवल एक ऐतिहासिक और धार्मिक व्यक्तित्व हैं, बल्कि एक जीवन की वास्तविकता और आदर्श का प्रतीक भी हैं। लेख में तुलसीदास के राम की भक्ति, प्रेम और उनकी जीवन दृष्टि को विस्तृत रूप में समझाया गया है, जो आज के समाज में भी प्रासंगिक है।

आचार्य प्रशांत ने लोकदेश में लिखा है कि जैसे किसी ने कलेजा भींच रखा हो, और फिर जरा तुम तनाव मुक्त हो जाओ, जरा तुम आश्वस्त और स्वतंत्र अनुभव करो। आंसू अगर सच्चे हों तो भीतर आनंद ही आनंद है। उन्होंने यह बताने का प्रयास किया है कि वास्तविक भावनाएं और सच्ची भावुकता ही हमें आंतरिक शांति और सुख प्रदान कर सकती हैं। सच्चे आंसू एक ऐसी स्थिति को दर्शाते हैं जहां दिल हल्का होता है और मन को गहरा संतोष मिलता है।

आचार्य प्रशांत ने दैनिक जागरण में लिखा है कि जीवन में दुःख आएगा, और यह भी सत्य है कि दुःख चला जाएगा। वे कहते हैं कि जब तुम्हारे जीवन में दुःख आएगा, तो तुम्हारा रोना स्वाभाविक होगा, लेकिन जब दुःख चला जाएगा, तब भी तुम रो सकते हो। इसका मतलब यह है कि पहले आँसू दुःख के होते हैं और दूसरे आँसू दुःख से मुक्ति के होते हैं।

आचार्य प्रशांत ने राष्ट्रीय सहारा में लिखा है कि नवरात्रि का समय शक्ति की समझ के लिए उपयुक्त है। वे बताते हैं कि शिव केंद्र और शिव सत्य का मतलब है कि शिव शाश्वत सत्य और शांति का प्रतीक हैं। वहीं, शक्ति जीवन का प्रतीक है, जो जीवन को ऊर्जा और गति प्रदान करती है। आचार्य प्रशांत के अनुसार, नवरात्रि के अवसर पर हमें शक्ति की इस महत्वपूर्ण भूमिका को समझना चाहिए और इसे अपनी जीवन यात्रा में एक मार्गदर्शक के रूप में स्वीकार करना चाहिए।

आचार्य प्रशांत ने अमर उजाला के इस लेख में बताया है कि जीवन का असली संघर्ष बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि हमारे मन के विकारों से है। उन्होंने समझाया कि हमारा मानव जीवन कीमती है और इसे सही दिशा में ले जाने के लिए हमें अपने मन के विकारों को पहचानना और हटाना जरूरी है। लेख में आचार्य प्रशांत ने कहा कि हमारे मन में उठने वाले क्रोध, लालच, ईर्ष्या, और अन्य नकारात्मक भावनाओं को नियंत्रित करना असली संघर्ष है। उन्होंने जोर दिया कि आत्म-चिंतन और आत्म-साक्षात्कार के माध्यम से हम अपने भीतर के इन विकारों से मुक्ति पा सकते हैं और सच्चे अर्थों में आध्यात्मिक जीवन जी सकते हैं।

आचार्य प्रशांत बताते हैं कि हम जन्म से ही दुख में जीते हैं और इसका सही ज्ञान नहीं होता। वे कहते हैं कि अपने दर्द को समझना ही सही मार्ग दिखा सकता है। इस लेख में आत्मज्ञान, संवेदनशीलता, और मन की स्थिरता पर जोर दिया गया है। राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में, यह बताया गया है कि अगर हम अपनी स्थिति का सटीक संज्ञान लें तो हमारी भटकन समाप्त हो सकती है।

रक्षाबंधन का सही अर्थ समझाते हुए राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने कहा कि यह केवल भाई-बहन के बीच का पर्व नहीं है। विभिन्न पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में रक्षा के व्यापक अर्थ दिए गए हैं। आज हमें पर्यावरण, भाषा, संस्कृति और समाज की रक्षा की जरूरत है। यह पर्व हमें व्यापक दृष्टिकोण अपनाने और सभी कमजोर एवं जरूरतमंदों की रक्षा करने का संदेश देता है। आचार्य प्रशांत ने कहा कि हमें हर प्रकार की सुरक्षा और संरक्षण के लिए प्रयास करना चाहिए।

आचार्य प्रशांत ने यज्ञ के वास्तविक अर्थ पर चर्चा करते हुए दैनिक जागरण के इस लेख में बताया कि आज के समय में लोग यज्ञ का सही अर्थ नहीं समझते। यज्ञ का मतलब केवल पूजा-पाठ नहीं है, बल्कि यह आत्मिक और आध्यात्मिक शुद्धि का माध्यम है। यदि हम यज्ञ का सही मतलब नहीं जानते, तो इसका सही लाभ भी नहीं उठा सकते। यज्ञ के सही अर्थ को समझना और उसका पालन करना ही सच्ची भक्ति है।

आचार्य प्रशांत ने दैनिक जागरण के इस लेख में बताया कि हमारी परेशानियों का समाधान हमारे स्वयं के भीतर है। यदि हम अपनी वास्तविक समस्या को पहचानें और उसे सही तरीके से समझें, तो हम उसका सही समाधान पा सकते हैं। इधर-उधर भटकने और बाहरी उपायों पर निर्भर रहने के बजाय हमें अपने अंदर झांकने और समस्या के मूल कारण को समझने की आवश्यकता है। सच्ची शांति और समाधान तभी मिल सकता है जब हम अपनी समस्याओं का सामना ईमानदारी से करें।

आचार्य प्रशांत ने दैनिक जागरण के इस लेख में बताया कि अध्यात्म एक अंतिम बिंदु का नाम है, जो सामान्य जीवन से बहुत अलग है। यह आत्म-जागरण और सच्ची समझ की ओर ले जाता है। उन्होंने कहा कि शरीर और इस दुनिया में आना शुभ है, लेकिन असली शांति और खुशी अध्यात्म के माध्यम से ही प्राप्त होती है। अध्यात्म का अर्थ है, अपने सच्चे आत्म को जानना और अपने मूल उद्देश्य को समझना।

राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने धर्म-परिवर्तन पर हो रहे विवाद पर कहा कि यह आत्मिक शांति और सच्चे धर्म की खोज में होना चाहिए, न कि आर्थिक या शारीरिक लाभ के लिए। उन्होंने समझाया कि बाहरी दिखावे या लाभ के लिए धर्म बदलना आत्मिक विकास में बाधा उत्पन्न कर सकता है।

तुम्हारे शरीर पर अगर चोट लग जाए, ख़ास तौर पर यदि मस्तिष्क में कोई आकर हथौड़ा मार दे तो कहाँ गई चेतना? कहाँ गई बुद्धि? तो मनुष्य को यह समझना होगा कि है तो वह प्रकृति का ही पुत्र है। शरीर माँ है जिससे चेतना उठती है और चेतना पुरुष है—इसकी अवहेलना करके तुम कहीं पहुँच नहीं सकते, कम-से-कम तुम कोई विजय नहीं पा सकते।

अमर उजाला में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत लिखते हैं अपना भला-बुरा सोचने-समझने की शक्ति आपको धीरे-धीरे हर हालात से लड़ना सिखा देती है और इस काबिल बना देती है कि आप दूसरों की परछाई से निकलकर अपने जीवन के अहम निर्णय खुद ले सकें। खुद पर दूसरों की सोच हावी नहीं होने दें और अपनी विचारधारा को स्पष्ट रखें। आलोचनाओं से प्रभावित हुए बिना अपने उद्देश्य की ओर आगे बढ़ें। अपनी ताकत और कमजोरियों को पहचानकर जीवन में आत्मनिर्भर बनें। आत्मनिर्भरता ही आपकी सच्ची शक्ति है।

आचार्य प्रशांत द्वारा लोकदेश में लिखा यह लेख शिवलिंग की पूजा के पीछे के आध्यात्मिक महत्व को स्पष्ट करता है। शिवलिंग चेतना का प्रतीक है। वे बताते हैं कि शिवलिंग की पूजा न केवल पौराणिक कथाओं में बल्कि हमारे जीवन के विभिन्न पहलुओं में भी गहरी अर्थवत्ता रखती है। शिवलिंग को चेतना और सृजनात्मक शक्ति के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।

राष्ट्रीय हिंदी मेल के इस लेख में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि हमें सबसे कठिन काम को प्राथमिकता देनी चाहिए। कठिनाइयों का सामना करने से आत्म-विकास और दृढ़ता का निर्माण होता है। समस्याओं से निपटते समय हमें धैर्य, आत्म-संयम, और निरंतर प्रयास की आवश्यकता होती है। इस प्रक्रिया में अन्य कार्य भी सहजता से पूर्ण हो जाते हैं।

इस लेख में आचार्य प्रशांत ने गहराई से विश्लेषण किया है कि क्यों गलत आदतें और विचारधाराएं हमारे जीवन से हटने का नाम नहीं लेतीं। उन्होंने बताया कि गलतियों को पकड़कर रखने का कारण हमारा मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक जकड़न है। लेख में आचार्य प्रशांत ने आत्मनिरीक्षण और आत्मज्ञान के माध्यम से इन गलतियों से मुक्ति पाने के उपाय सुझाए हैं। - Loledg

आचार्य प्रशांत ने "मयूर संवाद" में बताया कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल के लिए उन्हें उनकी स्वाभाविकता और मौलिकता के साथ बढ़ने देना चाहिए। उन्होंने कहा कि बच्चों पर शैक्षिक सफलता का बोझ डालने के बजाय, उनके खेल-कूद और रचनात्मकता को प्रोत्साहित करना जरूरी है। बच्चों को उनके तनाव से मुक्त करने के लिए उन्हें अपनी रुचियों को खोजने और उनके अनुसार बढ़ने का अवसर देना चाहिए।

"स्वतंत्र चेतना" में आचार्य प्रशांत ने इंटरनेट के युग में किताबों की घटती लोकप्रियता पर चिंता जताई है। उन्होंने बताया कि डिजिटल मीडिया और मनोरंजन के बढ़ते प्रभाव के कारण किताबों की बिक्री में भारी गिरावट आई है। आचार्य प्रशांत ने कहा कि किताबें गहन ज्ञान और आत्म-विश्लेषण के लिए आवश्यक हैं, और उनके बिना समाज में गंभीरता और समझ का अभाव हो सकता है।

"दैनिक लोकदेश" में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत ने ग्लोबल वार्मिंग के खतरों पर प्रकाश डाला है। उन्होंने बताया कि हम लगातार विनाश की ओर बढ़ रहे हैं और इसे रोकने के लिए तुरंत कार्रवाई की आवश्यकता है। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण के लिए व्यक्तिगत और सामूहिक प्रयासों पर जोर दिया, ताकि आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित और स्वस्थ पर्यावरण मिल सके।

"दैनिक लोकदेश" में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत ने नई कहानी लिखने की प्रेरणा दी है। उन्होंने कहा कि बदलाव लाने के लिए जागरूक होना जरूरी है और हमें अपने पुराने विचारों और प्रथाओं को बदलने की हिम्मत करनी चाहिए। आचार्य प्रशांत ने बताया कि अगर हम बड़े बदलाव की चाह रखते हैं, तो हमें खुद को और समाज को बदलने के लिए आगे आना होगा और नए दृष्टिकोण अपनाने होंगे।

"लोकदेश" में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत ने कहा कि आध्यात्म संसार में आने का नहीं, बल्कि अंतिम विदाई का नाम है। उन्होंने समझाया कि सच्चा आध्यात्म व्यक्ति को माया और भ्रम से मुक्त करता है। आचार्य प्रशांत ने आत्मज्ञान की राह पर चलने और भौतिक इच्छाओं को त्यागने की आवश्यकता पर जोर दिया।

You had been living very wrongly — now life itself is telling you. Out of ten, only one understands that this pandemic is conveying something, that there is something we must learn. Life is trying to tell you that you had been living in a deeply mistaken way.