Coverage of his work in the national and international press: his gatherings, dialogues, recognitions, and milestones.

At the ‘Sant Sarita’ session held at the IIMT Ladder Business Foundation, Acharya Prashant advised athletes to look beyond worrying about results and focus on their game and effort. Jay Meena of Dewas made history on 23 September by winning the bronze medal in men’s singles soft tennis at the Aichi-Nagoya Asian Games.

A ‘Weekend with Master’ session with the philosopher and author of the AP Framework, Acharya Prashant, was held on Saturday in Knowledge Park. Jay Meena, who won the bronze medal for the country in the soft tennis event at the Asian Games held in Japan, attended the session with his coach Sudesh Sangte.

"Acharya Prashant has shared a message for the youth protesting the NEET paper leak. The demand for action, he said, has been raised so loud that the protester himself is never examined. He said that he has no problem with the street, only with the blindness on it. The movement is not wrong, but its sequence has been inverted. He clarified that he was not asking for the protest to be stopped, but proposing a fitness test."

Acharya Prashant's Britain Tour and Cambridge University Video Britain Tour and Cambridge University Video of Acharya Prashant. Now covered in Inshorts!

"Unlike most contemporary spiritual works, which are often collections of talks or conversations, the AP Framework is a deliberately organised, book-length work. It covers seven major areas of philosophy and includes an extensive glossary of specialised terms. It has also been published as a physical volume, The AP Framework. The framework also has a practical digital expression in AP Mirror, an LLM-based application designed to bring its method of self-inquiry into personal situations."

"The flood that tore through Nepal’s Rasuwa district did not begin in the mountains, philosopher and author Acharya Prashant has said. It began, in his account, in the restless human desire that treats the earth as fuel for itself. Asked why climate change was conspicuously missing from the news coverage of this tragedy, he said the word was kept out because naming it would implicate everyone who lives an ordinary consuming life. “Every emitter is responsible for these deaths,” he said."

"Yoga is not relief, but revolution. It begins where your excuses end. You cannot be in yoga and continue to live as you were"

"Philosophy sessions in engineering campuses are not new. What is new is a 1500 seater auditorium overflowing thirty minutes before start time, students sitting on staircases, and interactions stretching to seven hours because nobody wants to leave."
FOR THE PRESS

On the stage of Sahitya Aaj Tak, Acharya Prashant said that what the world is doing, asking you to do, try it. One should never give up one's right to test. Acharya Prashant said about the youth, 'Young people want to use life at the highest level, but they do not see ideals anywhere.

News 24 के मंच पर आचार्य प्रशांत ने कहा कि देखों, त्यौहार तो एक ही होता है और त्यौहार की रोशनी भी एक ही होती है। तो इनके अनुसार, दिवाली का मतलब जब मन रौशन हुआ तब दिवाली जानो।

आचार्य प्रशांत ने पत्रिका के इस लेख में कहा कि त्यौहार का मतलब होता है- ‘आप राम की ओर वापस गए।’ त्यौहार का मतलब होता है कि अंधेरे को रोशनी की सुध आ गई और अंधेरा जब रोशनी की तरफ मिटता है तभी उसके कदम बढ़ते हैं। दिवाली राम की कोई घर वापसी नहीं होती, आप की राम वापसी होती है।

During the Geeta Deepotsav programme held at Gautam Buddha University in Greater Noida on Monday, Acharya Prashant dwelt on the outer and inner celebration of Deepawali. He emphasized that while outer celebration is important, it is devoid of any meaning if one's life is not illuminated by the inner light of wisdom. 'Superficial celebrations in the name of religion, devoid of spiritual depth, do not lead to genuine fulfillment,' he said, adding that without inner transformation, Deepawali celebration is meaningless.


इस लेख में दैनिक भास्कर ने प्रकाशित किया है की आचार्य प्रशांत ने गीता दीपोत्सव में कहा कि जीवन बदलने के लिए ज्ञान का एक दीपक ही पर्याप्त है। इस समारोह में देश के विभिन्न राज्यों से हजारों साधक पहुंचे। आचार्य प्रशांत ने संत कबीर के दोहों पर विस्तार से चर्चा की और बताया कि दिवाली तभी सार्थक होती है जब मन में भी प्रकाश हो। उन्होंने गीता के महत्व पर भी प्रकाश डाला और बताया कि यह ग्रंथ मानव को जीवन जीने का सही मार्ग दिखाता है। समारोह में उपस्थित साधकों ने आचार्य प्रशांत के प्रवचनों से प्रेरणा प्राप्त की और ज्ञान के इस दीपक को अपने जीवन में आत्मसात करने का संकल्प लिया।

Acharya Prashant explores the timeless wisdom of the Bhagavad Gita and the profound significance of Diwali during the Geeta Deepotsav at Gautam Buddha University. Emphasizing selfless action and inner illumination, he delves into the Gita's teachings on overcoming ego and ignorance for a meaningful life in today's world.
इस लेख में दैनिक भास्कर ने प्रकाशित किया है की आचार्य प्रशांत ने गीता दीपोत्सव में कहा कि जीवन बदलने के लिए ज्ञान का एक दीपक ही पर्याप्त है। इस समारोह में देश के विभिन्न राज्यों से हजारों साधक पहुंचे। आचार्य प्रशांत ने संत कबीर के दोहों पर विस्तार से चर्चा की और बताया कि दिवाली तभी सार्थक होती है जब मन में भी प्रकाश हो। उन्होंने गीता के महत्व पर भी प्रकाश डाला और बताया कि यह ग्रंथ मानव को जीवन जीने का सही मार्ग दिखाता है। समारोह में उपस्थित साधकों ने आचार्य प्रशांत के प्रवचनों से प्रेरणा प्राप्त की और ज्ञान के इस दीपक को अपने जीवन में आत्मसात करने का संकल्प लिया।

अद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक और जाने-माने मोटिवेशनल स्पीकर आचार्य प्रशांत आज के युवाओं के लिए एक ऐसे मार्गदर्शक बनकर उभरे हैं जो जिंदगी की परेशानियों को न केवल आम भाषा में समझाते हैं बल्कि उसका उपाय भी बताते हैं।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत कहते हैं की रावण हो या हनुमान, या फिर विभीषण हृदय में तो सबके राम ही होते हैं। हनुमान का ये है कि राम उनके हृदय में भी हैं, और राम उनके जीवन में भी हैं। रावण का ये है कि जीवन तो उसका रावण का है और दिल उसने राम को दे रखा है। तो फिर वहां पर क्या आ जाता है? विभाजन आ जाता है, द्वंद आ जाता है।

TV9 के इस लेख में आचार्य प्रशांत कहते हैं की आंतरिक विभाजन का ही नाम रावण है और सत्य के अतिरिक्त, आत्मा के अतिरिक्त जो कुछ भी है वो विभाजित है. जहां विभाजन है, वहांं आप चैन नहीं पा सकते. राम का कोई केंद्र ही नहीं है, जो मुक्त आकाश का हो गया वही राम है. आकाश का केंद्र आप नहीं बता पाएंगे. आकाश में तो तुम जहां पर हो वहीं पर केंद्र है; अनंत है

आचार्य प्रशांत ने अमर उजाला में लिखा है कि विचार और भावनाओं के बीच की दीवार बहुत पतली होती है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति भावनाओं से मुक्ति पा लेता है और भावनाओं को महत्व देना कम कर देता है, उसने एक बड़ी लड़ाई जीत ली है। आचार्य प्रशांत के अनुसार, भावनाएं अक्सर हमारे विचारों को प्रभावित करती हैं और इस तरह से जीवन की सच्चाई को देखने में बाधा डालती हैं। जब हम भावनाओं को कम महत्व देते हैं और उन्हें नियंत्रित कर लेते हैं, तो हम मानसिक और आध्यात्मिक दृष्टि से स्वतंत्रता प्राप्त कर सकते हैं।

आचार्य प्रशांत ने दैनिक जागरण में इज़राइल-हमास युद्ध पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि युद्ध का कारण यह है कि जब हर व्यक्ति अपनी मान्यता और विश्वास पर अडिग रहेगा, तो संघर्ष होना स्वाभाविक है। वे बताते हैं कि जब लोग अपनी-अपनी मान्यताओं और विचारधाराओं पर जोर देते हैं और किसी भी समझौते या सहमति के लिए तैयार नहीं होते, तो टकराव और संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होती है।

There's an ongoing fight between Islam and Judaism, which both belong to the Abrahamic religion group.

आचार्य प्रशांत अमर उजाला में लिखते हैं, धर्म का वास्तविक उद्देश्य होता है इंसान को उसके बंधन से और दुःख से आजाद करना और जब धर्म वास्तविक नहीं होता, आपको आनंद नहीं दे पाता तो आप चिढ़े-चिढ़े घूमते हो क्योंकि सब कुछ पालन करने के बाद भी भीतर से कोई त्रिप्ती शांति मिल नहीं रही होती। ऐसे में कोई आ करके थोड़ा आपको कोच दे, थोड़ा आपके जो भी इष्ट हैं, उनको एक दो चुभती बातें बोल दे तो आप के भीतर तुरंत विस्फोट हो जाएगा, हिंसा ऐसे ही जन्म लेती है।

Acharya Prashant delves into the causes of conflict and cruelty rooted in religious beliefs, highlighting how personal interpretations and faith differences escalate tensions, using the Israel-Hamas conflict as a case study. He advocates for a deeper, introspective approach to religion that fosters understanding and respect amidst diversity.

Especially in the modern world, unfortunately, a degree of constant anxiety has become an almost normalized state for us. A large portion of our mental health problems as a collective is very much about anxiety and fear. Burn-outs, career pressures, problems with self-esteem, fear of others, stress about studies etc. All of this is anxiety at its root and very commonplace.

आचार्य प्रशांत ने विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर लिखा है कि आज बहुत तेजी से बच्चे और व्यस्क, शिक्षा संबंधी या रोज़गार संबंधी असफलताओं के चलते अवसाद के शिकार बनते जा रहे हैं और फ़िर इसी अवसाद के चलते वे आत्महत्या करने का निर्णय तक ले लेते हैं, जो बहुत चिंताजनक और दुखदाई है।

आचार्य प्रशांत ने अमर उजाला के इस लेख में बताया है कि जीवन में किसी चीज़ से जल्दी प्रभावित होकर पीछे हटने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए। उन्होंने समझाया कि जो कार्य हम कर रहे हैं यदि वह स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण है, तो उसे प्राथमिकता देनी चाहिए। लेख में आचार्य प्रशांत ने जोर दिया कि एक सरल और श्रेष्ठतम मन ही सच्चे आध्यात्मिकता को प्राप्त कर सकता है। उन्होंने कहा कि जो लोग भौतिक सुख-सुविधाओं में उलझ जाते हैं, वे सच्चे आध्यात्मिक आनंद से वंचित रह जाते हैं।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत महात्मा गांधी की शिक्षा और उनके आदर्शों की आज के समय में प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हैं। वे बताते हैं कि गांधीजी के सिद्धांत और उनके द्वारा स्थापित मूल्य वर्तमान समय में क्यों और कैसे महत्वपूर्ण हैं। लेख में गांधीजी के जीवन के विभिन्न पहलुओं और उनके द्वारा दी गई सीखों को आधुनिक संदर्भ में समझाने का प्रयास किया गया है।

News24, in a piece by Acharya Prashant, highlights a lesser-known episode where Gandhi, advised by Gopal Krishna Gokhale to observe India for a year, later led the Champaran movement. This underscores the need for preparation and understanding before major actions, relevant to issues like climate change.

आचार्य प्रशांत ने सनातन धर्म और वेदांत के महत्व पर जोर देते हुए 1 अक्टूबर को "वेदांत दिवस" घोषित किया। भारत एक्सप्रेस के इस लेख में वेदों और उपनिषदों को धर्म का केंद्र मानते हुए उन्होंने कहा कि सनातन धर्म को पुनर्जीवित करने का एकमात्र तरीका उच्चतम ग्रंथों की प्रतिष्ठा है। उन्होंने "घर घर उपनिषद" अभियान शुरू किया है, जिसका उद्देश्य 20 करोड़ घरों तक उपनिषदों को पहुँचाना है। उनका मानना है कि वेदांत की पुनर्प्रतिष्ठा से जीवन का पुनर्प्रतिष्ठा होगा।

राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में, आचार्य प्रशांत ने सही और गलत के निर्णय लेने के महत्व पर प्रकाश डाला है। वे बताते हैं कि आत्म-जागरूकता और आत्म-चिंतन के माध्यम से सही निर्णय लेना महत्वपूर्ण है। सही निर्णय लेना एक कला है, जिसे आत्म-मूल्यांकन से सीखा जा सकता है।

अमर उजाला के इस लेख में, आचार्य प्रशांत ने एआई और चैट जीपीटी की सीमाओं पर चर्चा की है। वे बताते हैं कि एआई मानवीय गुणों जैसे प्रेम, करुणा और आध्यात्मिकता को नहीं समझ सकता।


अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत आलस्य के कारण मन में उत्पन्न होने वाली उदासीनता और निराशा के बारे में बताते हैं। वे इस बात पर जोर देते हैं कि धन के अभाव में व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाता है, जिससे गुलामी की स्थिति उत्पन्न होती है। आचार्य प्रशांत यह समझाते हैं कि आलस्य से निकलने का एकमात्र उपाय आत्मानुशासन और आत्मसाक्षात्कार है।

दैनिक जागरण के इस लेख में, आचार्य प्रशांत ने हिन्दी भाषा की गिरावट पर चर्चा की है। जापान और जर्मनी की तरह भारत में भी मातृभाषा के प्रति गर्व क्यों नहीं है, इस पर सवाल उठाया गया है। हिन्दी की उपेक्षा और अंग्रेजी के प्रभाव को मुख्य कारण बताया गया है। लेख में, हिन्दी के महत्व और उसकी समृद्धि के लिए जागरूकता फैलाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत लिखते है सनातन धर्म का अर्थ है जो काल की सीमाओं से परे हो, जिसमें निरंतरता हो। जो धर्म समय के अनुसार बदलता रहे, वही सनातन धर्म है। यह आपको हमेशा शांति की ओर अग्रसर करता है। आज का जो व्यावहारिक धर्म है, उसमें बदलाव की आवश्यकता है ताकि सनातन धर्म की मूल भावना को बनाए रखा जा सके। यह धर्म व्यक्ति को मानसिक और आत्मिक मुक्ति की ओर ले जाता है, उसे भय, भ्रम, और अज्ञान से मुक्त करता है, और उसे सच्चे ज्ञान की ओर प्रेरित करता है।

Udhayanidhi Stalin Controversy: Politics has been intense in the country since Udhayanidhi Stalin's remark about abolishing Sanatan Dharma. After all, what is the eternal religion, Acharya Prashant is telling.

Acharya Prashant delves into Sanatan Dharma's timeless essence, contrasting it with modern Hinduism. He emphasizes Sanatan Dharma's focus on eternal truths and self-knowledge to free individuals from suffering. Acharya Prashant advocates for embracing these principles to foster a liberated, compassionate society.

आचार्य प्रशांत कहते हैं कि असली लव-अफेयर किसी व्यक्ति या वस्तु से नहीं, बल्कि अपने काम से होना चाहिए। वे बताते हैं कि ऐसा काम चुनें जो न करने पर बेचैनी हो, जिसमें आपका दिल और मन पूरी तरह से लगा रहे। सच्चे प्रेम का मतलब है अपने कार्य में पूरी तल्लीनता से डूब जाना। यही असली खूबसूरती और सच्चे प्रेम का स्रोत है। -हिंदुस्तान

इस ABP Live साक्षात्कार में, आचार्य प्रशांत बताते हैं कि कैसे हम जीवन के तथ्यों के बावजूद आशा लगाए रखते हैं। वे समझाते हैं कि कैसे नई संभावनाओं की उम्मीद हमें जीवनभर नचाती रहती है, जबकि हमें कम ही मिलता है, लेकिन मिलने की आशा बहुत ज्यादा बनी रहती है। आचार्य प्रशांत का यह दृष्टिकोण हमें आशा और वास्तविकता के बीच के संतुलन को समझने में मदद करता है।

आचार्य प्रशांत ने ABP Live को दिए इंटरव्यू में अपनी IIT और IIM प्रशासनिक सेवाओं को छोड़कर आध्यात्मिकता की ओर मुड़ने के कारणों पर चर्चा की। आचार्य प्रशांत ने आत्मज्ञान के महत्व पर जोर दिया, जिससे उन्हें इस मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिली।

आचार्य प्रशांत राष्ट्रीय सहारा में लिखते है छल को पहचानने के लिए निष्ठुर नजर चाहिए। कपटी व्यक्ति दूसरे कपटी को नहीं पहचान सकता। छल का मतलब है पुरानी जानकारी से मेल न खाना। अगर आपका कुछ बिगड़ता है और दूसरा छल करता है, तो इसका मतलब है कि आपने अपनी शांति खो दी है। जो निर्दोष है, उसका छल कुछ नहीं बिगाड़ सकता। छल-कपट से नुकसान तब होता है जब आप भी कपटी होते हैं। यह खेल है जिसमें हार-जीत चलती रहती है। शरीर और संसार के रिश्ते बनते और टूटते रहते हैं। छल से बचने के लिए इस खेल से बाहर निकलें, फिर कोई नुकसान नहीं होगा।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत लिखते है हर पर्व हमें यह सिखाता है कि हम खुद को बदलें, हरेक पर्व यह अवसर देता है कि हम अपने जीवन को नई दिशा दें। जन्माष्टमी पर हमें श्रीकृष्ण के संदेशों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए। श्रीकृष्ण का संदेश हमें प्रेम, सत्य, और कर्तव्य की राह पर चलने की प्रेरणा देता है। यह पर्व हमें आत्मनिरीक्षण का मौका देता है, जिससे हम अपने जीवन को बेहतर बना सकते हैं।

शिक्षा जीवन का मूल आधार है, जो हमें सही दिशा और दृष्टिकोण प्रदान करती है। दैनिक जागरण के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने शिक्षा के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि शिक्षा न केवल जानकारी का संग्रह है, बल्कि यह हमें सोचने, समझने और सही निर्णय लेने की क्षमता भी प्रदान करती है। सही शिक्षा हमें जीवन के हर पहलू में समृद्ध बनाती है और हमें सच्चाई के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती है। शिक्षा का सही उपयोग हमें एक बेहतर समाज का निर्माण करने में सक्षम बनाता है।

आज के समय में अनुभव और श्रेष्ठजनों की शिक्षाओं का हमारे जीवन में विशेष महत्व है। अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने बताया कि यदि हम उनके सिद्धांतों को अपने जीवन में अपनाएं, तो हमें सफलता प्राप्त हो सकती है। श्रेष्ठजनों की सीख हमें सही दिशा में मार्गदर्शन करती है और हमारे जीवन को सफल बनाने में सहायक होती है। उनका मार्गदर्शन हमारे व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन को समृद्ध बना सकता है।

आचार्य प्रशांत ने राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में शिक्षा व्यवस्था की खामियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह प्रक्रिया सही दिशा में नहीं चल रही है। बच्चों की मानसिक स्थिति का ध्यान रखे बिना उन्हें ज्ञान देने की कोशिश की जा रही है। हमें बच्चों की शिक्षा में स्वाध्याय और आत्मचिंतन को शामिल करना चाहिए। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि बच्चों की शिक्षा केवल जानकारी देने तक सीमित न हो, बल्कि उन्हें सही तरीके से सोचने और समझने के योग्य बनाए।

आचार्य प्रशांत ने असली जवानी का मतलब समझाते हुए राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में कहा कि यह केवल शारीरिक अवस्था नहीं है, बल्कि प्रेम, ऊर्जा, उत्साह और सपनों से भरी एक मानसिक और आत्मिक स्थिति है। असली जवानी तब होती है जब हम सच्चाई की ओर आकर्षित होते हैं और अपने आत्म-ज्ञान को पहचानते हैं। यह अवस्था व्यक्ति को जीवन में गहराई और स्थिरता देती है, जिससे वह अपने जीवन का सच्चा आनंद ले सकता है।

आचार्य प्रशांत ने वीगनिज्म के आध्यात्मिक आधार पर जोर देते हुए राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में कहा कि यदि वीगनिज्म सच्चा है, तो यह आत्मिक विकास का हिस्सा होना चाहिए। उन्होंने बताया कि दूसरे जीवों पर अत्याचार न करना और न्यूनतम हिंसा का पालन करना सच्चे वीगनिज्म का मूल है। इसके माध्यम से व्यक्ति अपने शरीर और आत्मा को शुद्ध रख सकता है, जिससे जीवन में सच्ची शांति और संतुष्टि प्राप्त होती है।

IBC24 के इस लेख में आचार्य प्रशांत लिखते है शरीर का जन्म वासना से होता है, और इसे गलत क्यों नहीं माना जाना चाहिए। लेख में तर्क दिया गया है कि आत्मा न तो जन्म लेती है न मरती है, और वासना से उत्पन्न होने वाले शरीर को सही रूप में समझने की आवश्यकता है। आध्यात्मिक दृष्टि से, शरीर को केवल एक वाहन मानना चाहिए, न कि अंतिम सत्य।

Acharya Prashant discusses the core elements of professionalism, emphasizing commitment, prioritization, goal clarity, and decision-making. He delves into the importance of aligning work with one's deep needs and the joy derived from the process itself, highlighting the essence of true professional excellence.

आचार्य प्रशांत ने राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में पुनर्जन्म को आत्मिक जागरूकता का प्रतीक बताते हुए कहा कि सच्चा पुनर्जन्म हमारे जीवन में गहराई से आत्म-जागरूकता प्राप्त करने से होता है। उन्होंने बताया कि हमें अपने कर्म, विचार और आत्मिक उद्देश्य पर ध्यान देना चाहिए ताकि हम अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान सकें।

आचार्य प्रशांत ने राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में जीवन में हौसले के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि हर असफलता हमें नया सीखने और फिर से प्रयास करने का मौका देती है। निरंतर प्रयास और आत्मविश्वास हमें जीवन में सफलता दिला सकते हैं। हार को स्वीकार करना और उससे सीखना ही असली हौसला है। यह हमें मानसिक और आत्मिक रूप से मजबूत बनाता है और हमें अपने लक्ष्यों की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।

इस लेख में बताया गया है कि युवा पीढ़ी को आध्यात्म और भारतीय संस्कृति से जोड़ने की आवश्यकता है। आचार्य प्रशांत ने संस्कृति के अंधानुकरण के बजाय आत्म-साक्षात्कार पर जोर दिया है। प्रकाशित: अमर उजाला, 12 जुलाई 2023।

राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने असली सुंदरता का महत्व बताते हुए कहा कि बाहरी सुंदरता की तुलना में आंतरिक सुंदरता अधिक महत्वपूर्ण है। बाहरी सुंदरता क्षणिक और सतही होती है, जबकि आंतरिक सुंदरता स्थायी और गहरी होती है। सच्ची सुंदरता वह है जो व्यक्ति के विचारों, कार्यों और आत्मा में झलकती है।

दैनिक भास्कर में प्रकाशित लेख के अनुसार ग्रेटर नोएडा में आयोजित 'गीता समागम' श्रृंखला के तीसरे अध्याय 'कर्मयोग' पर आचार्य प्रशांत ने सत्र का संचालन किया। इस सत्र में उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों को सरल और सहज भाषा में प्रस्तुत कर, आम लोगों के जीवन को अर्थपूर्ण और आसान बनाने की दिशा में मार्गदर्शन दिया।

आचार्य प्रशांत ने भाषा के महत्व पर जोर देते हुए राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में कहा कि भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन में उपयोगिता के आधार पर ही जीवंत रहती है। उन्होंने बताया कि भाषा की सही शिक्षा हमें आत्मनिर्भर और सक्षम बनाती है। सही तरीके से भाषा का प्रयोग करने से रोजगार और सामाजिक स्तर पर बेहतरी मिलती है। आचार्य प्रशांत ने विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से यह समझाया कि भाषा की वास्तविक उपयोगिता कैसे जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकती है।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने जीवन में अपने लक्ष्यों को स्वयं निर्धारित करने के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि दूसरों के लक्ष्यों की नकल करने से सफलता नहीं मिलती। असली सफलता तभी प्राप्त होती है जब लक्ष्य खुद तय किया जाए और उस पर ईमानदारी से काम किया जाए। अपनी पहचान और रुचियों के अनुसार लक्ष्य निर्धारण करना जीवन को सही दिशा देता है और सफलता की संभावनाएं बढ़ाता है।

आचार्य प्रशांत ने ग्रेटर नोएडा में संत सरिता श्रृंखला के दौरान बताया कि जीवन में बदलाव के लिए आत्मनिर्भरता आवश्यक है। राष्ट्रीय सहारा के अनुसार, उन्होंने कहा कि बाहरी स्थितियों को दोष देने के बजाय व्यक्ति को खुद जिम्मेदारी उठानी चाहिए।

राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने समाज में धर्म-परिवर्तन पर हो रहे विवाद पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि धर्म-परिवर्तन का फैसला आर्थिक या शारीरिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और सच्चे धर्म की खोज में होना चाहिए। सच्चा धर्म प्रेम, करुणा और आत्मज्ञान पर आधारित होता है। धर्म-परिवर्तन का निर्णय सोच-समझ कर और आत्म-विश्लेषण के बाद ही लेना चाहिए। आचार्य प्रशांत ने बताया कि बाहरी दिखावे या लाभ के लिए धर्म बदलना आत्मिक विकास में बाधा उत्पन्न कर सकता है।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने खेल और जीवन के मैदान में जीत और हार के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि असली उद्देश्य सिर्फ जीतना नहीं, बल्कि अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना है। हर प्रदर्शन हमें पहले से बेहतर बनाता है, और इसमें हार का भी महत्व है। आचार्य प्रशांत के अनुसार, सही दृष्टिकोण से जीत और हार दोनों से सीखा जा सकता है, जिससे जीवन में संतुलन और स्थिरता आती है। जीवन को खेल की तरह अपनाकर ही हम असली सफलता पा सकते हैं।

दैनिक जागरण के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने आधुनिकता और विकास में सिर्फ आर्थिक पहलुओं पर जोर देने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि विकास को आर्थिक आंकड़ों तक सीमित करना पर्याप्त नहीं है। शिक्षा, स्वास्थ्य, और सामाजिक प्रगति जैसे मानकों को भी ध्यान में रखना जरूरी है। भारत में गरीबी की स्थिति और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी को देखते हुए व्यापक दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। आर्थिक विकास के साथ-साथ समग्र विकास की दिशा में काम करना आवश्यक है।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने प्रतियोगी परीक्षाओं में असफलता से निराश न होने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि जीवन में कई बार असफलता एक बड़ी सफलता का आधार बनती है। असफलता से निराश होकर रुकने के बजाय उससे सीख लेकर आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने बताया कि निरंतर प्रयास और आत्म-विश्लेषण से ही वास्तविक सफलता प्राप्त की जा सकती है। असफलता को एक सीख के रूप में स्वीकारें और उससे प्रेरणा लेकर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ें।

IBC24 में प्रकाशित लेख में आचार्य प्रशांत ने कहा कि जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य अपनी मुक्ति और जगत का कल्याण है। अपनी मुक्ति के लिए आत्मज्ञान आवश्यक है, जिसे उपनिषदों और संतवाणी से प्राप्त किया जा सकता है। ग्रेटर नोएडा में जीएन ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूट में आयोजित दो दिवसीय संत समागम में उन्होंने यह बातें साझा कीं। उन्होंने आत्मा से दूरी को दुख का मुख्य कारण बताया और गुरु की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला।

दैनिक भास्कर में प्रकाशित लेख के अनुसार आचार्य प्रशांत को IIT दिल्ली एलुमनी अवार्ड से सम्मानित किया गया है। एसोसिएशन के सचिव ने कहा कि आचार्य हमेशा से IIT दिल्ली परिसर की गरिमा बढ़ाते रहे हैं। यह अवार्ड उनके द्वारा किए गए उत्कृष्ट कार्यों और संस्थान के प्रति उनके योगदान को मान्यता देता है। आचार्य प्रशांत का यह सम्मान प्रेरणा का स्रोत है, जो छात्रों और एलुमनी को उनके आदर्शों का पालन करने के लिए प्रेरित करता है।

प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक और पूर्व सिविल सेवा अधिकारी आचार्य प्रशांत ने दैनिक भास्कर में प्रकाशित लेख के अनुसार कहा कि जीवन में करने योग्य एक ही काम है, अपनी मुक्ति और जगत का कल्याण। अपनी मुक्ति के लिए आत्मज्ञान जरूरी है। उसके लिए हमें उपनिषदों के पास आने होगा। सामान्यजन के लिए उपनिषदों का व्यवहारिक ज्ञान हमें संतवाणी से ही मिल सकता है।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने मानव जीवन में कर्म के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि हमारे कर्म ही जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं। घर-परिवार से लेकर दुनियादारी निभाने तक, हर पहलू में कर्म की अहमियत है। उन्होंने बताया कि सही कर्म करने से ही मनुष्य सच्चे अर्थों में मानवता का पालन कर सकता है। जीवन में कर्म और मनुष्यता का गहरा संबंध है, जो हमारे भविष्य को आकार देता है।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने कहा कि अपने जीवन की जिम्मेदारियों को समझना और उन्हें पूरी तरह निभाना सफलता की कुंजी है। हर कार्य की जिम्मेदारी स्वयं लेने से व्यक्ति अपने जीवन में सुधार कर सकता है। उन्होंने बताया कि आत्मनिर्भरता और स्वयं की जिम्मेदारी उठाना जीवन में सकारात्मक बदलाव लाता है। अपनी जिम्मेदारियों को स्वीकार करना और उनका पालन करना ही सच्ची सफलता का मार्ग है।

स्पीकिंग ट्री के इस लेख में इला गोस्वामी आचार्य प्रशांत की पुस्तक 'माया' पर लिखती हैं। वे बताती हैं कि अक्सर हम सभी मनुष्यों के चित्त में उठने वाले सवाल एक जैसे ही होते हैं क्योंकि हम सभी आसपास जो महसूस कर रहे हैं, जिन चीज़ों के साथ हमारा तालमेल है और जिस सोच के साथ हम आगे बढ़ रहें हैं, वह सभी एक ही फैक्टर से प्रभावित होता है, वह है ‘माया’।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने बताया कि सकारात्मक सोच और प्रेरणा से जीवन की कठिनाइयों को आसानी से हल किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि हमारी सोच का प्रभाव हमारे कार्यों और परिणामों पर पड़ता है। हर स्थिति में प्रेरित और सकारात्मक रहने से हम अपनी क्षमताओं को पहचानते हैं और अपने लक्ष्यों को हासिल कर सकते हैं।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने बताया कि खुद को बेसहारा समझने की बजाय आत्मविश्वास के साथ सिर उठा कर जीना सीखें। आत्मनिर्भरता से जीवन में आने वाली हर चुनौती का सामना किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि अपनी कमजोरियों को पहचानकर उन्हें अपनी ताकत बनाएं। सही दृष्टिकोण और मेहनत से कोई भी कमजोरी ताकत में बदल सकती है। यह लेख बताता है कि आत्म-विश्वास और संकल्प शक्ति से कैसे हर मुश्किल को पार किया जा सकता है।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने बताया कि भारतीय संस्कृति में गुरु का दर्जा भगवान के समान माना जाता है। गुरु हमें सही संस्कारों की राह पर चलने की शिक्षा देकर हमारा मार्ग प्रशस्त करते हैं। एक सच्चा गुरु पथ-प्रदर्शक की तरह होता है, जो हमारे जीवन को सही दिशा में ले जाने में मदद करता है। गुरु का महत्व इसलिए भी है क्योंकि वे हमें आत्मिक ज्ञान और जीवन के सही मूल्य सिखाते हैं, जिससे हम जीवन में सफल और संतुष्ट हो सकें।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने बताया कि आरामपरस्त जीवनशैली को त्यागकर जिम्मेदारियों का बोझ उठाना आवश्यक है। जब तक आप जिम्मेदार नहीं बनेंगे, तब तक जीवन के दौड़ में पीछे ही रह जाएंगे। उन्होंने समझाया कि आत्मनिर्भरता और जिम्मेदारी निभाने से ही व्यक्ति जीवन में सफलता और संतुष्टि पा सकता है। अपनी जिम्मेदारियों को निभाना सच्चे आत्मसम्मान और आत्मविकास का मार्ग है।

राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने जन्म और मृत्यु की प्रक्रिया पर विचार करते हुए बताया कि ये प्रकृति के खेल हैं, जिसमें कोई बदलाव नहीं होता। उन्होंने कहा कि आत्मा की सही खोज प्रकृति में नहीं, बल्कि आत्मज्ञान में है। बाहरी दुनिया में सत्य की खोज करने से व्यक्ति निराशा पाता है, जबकि आत्मज्ञान से ही सच्चे सुख और शांति की प्राप्ति होती है।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने बताया कि जीवन में सफल होने के लिए लक्ष्य निर्धारित करना आवश्यक है, लेकिन उसे प्राप्त करने के लिए मशीन की तरह काम करना नहीं, बल्कि रचनात्मक सोच को अपनाना जरूरी है। उन्होंने समझाया कि मनुष्य केवल भौतिक कार्यों का निष्पादन करने वाला यंत्र नहीं है, बल्कि उसमें आत्मिक और रचनात्मक क्षमताएं भी हैं। सही दृष्टिकोण और रचनात्मकता से ही जीवन को सार्थक बनाया जा सकता है।

According to an article published in Amar Ujala, Acharya Prashant, the founder of the Prashant Advait Foundation, delivered a lecture on the scientific significance of time during a two-day workshop in Rishikesh. He stated that one must clearly see the relationship between thought and time; only then can we make the right and balanced use of time, which is life's most precious resource.

In an address at a Rishikesh workshop, Acharya Prashant emphasized that spirituality is the only way to overcome sorrow. He discussed the importance of accepting sadness to gradually alleviate it and highlighted the necessity of recognizing the value of time and living with clarity to achieve liberation.

Acharya Prashant emphasizes that liberation is the ultimate aim of life. He argues that true freedom and fulfillment come from aligning with one's inner self and living a life of spiritual clarity. Acharya Prashant advocates for the integration of spiritual practices into daily life, viewing them as essential for overcoming life's turmoil and achieving lasting peace and contentment (Garhwal Post) (Garhwal Post).

Acharya Prashant explores how fear drives people towards faith rather than an understanding of spiritual principles. Through compelling anecdotes and profound insights, he emphasizes that fear can often be a catalyst for spiritual awakening and devotion, particularly in challenging times. This piece delves into the intricate relationship between fear and faith, encouraging readers to find strength and wisdom in their spiritual journey

हिंदुस्तान न्यूज़ में प्रकाशित लेख के अनुसार प्रशांत अद्वैत संस्था के संस्थापक आचार्य प्रशांत ने ऋषिकेश में आयोजित कार्यक्रम में समय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि समय दुनिया में सबसे मूल्यवान है। प्रकृति बदलती है और समय के हिसाब से जीवन में बदलाव अनिवार्य है।

Explaining 'Kaal', which means time, Acharya Prashant, the founder of the Prashant Advait Foundation, stated that time is the most valuable and precious thing in the world. "I am" and the world exists—this creates duality. From this, time is constructed.

राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने बताया कि ध्यान में अपने-आप में कुछ भी नहीं है। ध्यान को जब भी कुछ बनाया जाएगा, तो ध्यान के साथ दुर्व्यवहार हो जाएगा। हमारा स्वभाव है ध्यान। ध्यान कोई क्रिया नहीं है। ध्यान का मतलब होता है कि कोशिश किए बिना, मन एकाग्रता की स्थिति में हो। ध्यान केवल आत्मसाक्षात्कार की स्थिति है, जिसमें मन का आत्मा से गहरा संबंध हो जाता है। ध्यान एक ऐसी स्थिति है, जिसमें मन बिना किसी प्रयास के, अपनी स्वाभाविक स्थिति में स्थिर हो जाता है।

अमर उजाला में प्रकाशित आचार्य प्रशांत के इस लेख में जीवन में लक्ष्य निर्धारित करने और उन्हें प्राप्त करने की संकल्प शक्ति पर जोर दिया गया है। वह बताते हैं कि संकल्प शक्ति से व्यक्ति अपने प्रयासों को सही दिशा में केंद्रित कर सकता है, जिससे सफलता के द्वार खुलते हैं। इस लेख में उन्होंने संकल्प शक्ति को मजबूत करने के तरीकों पर चर्चा की है और बताया है कि कैसे संकल्प शक्ति से जीवन में सकारात्मक बदलाव लाए जा सकते हैं।

राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत लिखते हैं त्याग का मतलब है जो कुछ है, उसे पहचान कर उसका त्याग कर देना। सही मायनों में त्याग तिरस्कार नहीं है, वह हमारी जरूरतों से जुड़ा है। भारत में गलत तरीके से त्याग की अवधारणा को समझा गया है। त्याग केवल खाने-पीने का नहीं बल्कि अपने अंदर की गलत सोच और आदतों का भी त्याग करना है। त्याग का सही मतलब तभी समझ में आता है जब हम जीवन के प्रति अपनी सोच को बदलते हैं और सही दिशा में आगे बढ़ते हैं।

हिन्दूस्तान में प्रकाशित लेख के अनुसार आचार्य प्रशांत ने ऋषिकेश में एक कार्यक्रम में कहा कि जो सदा, सर्वदा, निरलेप, निरंजन, निर्विकार है, उसे ही शाश्वत सत्य कहते हैं। मन को दुःख से मुक्ति मिले यही धर्म है, खुद से आजाद होना ही सनातन है।

अमर उजाला में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि जीवन में हार और जीत के अनुभव कैसे हमारी मानसिकता और जीवन दृष्टिकोण को प्रभावित करते हैं। वह उदाहरण देते हैं कि कैसे इतिहास के कई महान व्यक्तियों ने अपनी हार से सीखा और आगे बढ़े। उनके विचार में, सच्ची जीत वही है जो हमारी आत्मा को मजबूती और मन को शांति प्रदान करे, चाहे परिणाम कुछ भी हो। यह लेख प्रेरणा देता है कि हम हर परिस्थिति में धैर्य और साहस के साथ खड़े रहें।

दैनिक जागरण के इस लेख में आचार्य प्रशांत की पुस्तक "मुक्ति" की समीक्षा की गई है। यह पुस्तक व्यक्ति को बाहरी और आंतरिक बाधाओं से मुक्ति दिलाने के लिए मार्गदर्शन प्रदान करती है। इसमें आत्मज्ञान, आत्मनिरीक्षण, और मानव जीवन के गहन अर्थों पर विस्तृत चर्चा की गई है। आचार्य प्रशांत ने सरल भाषा में गूढ़ विषयों को समझाया है, जो हर व्यक्ति के जीवन में आध्यात्मिक उत्थान ला सकती है।

राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि जब तक व्यक्ति दुनिया के सामने रहता है, तब तक वह अपने वास्तविक स्व को नहीं देख पाता। ध्यान का अभ्यास करने से व्यक्ति अपने मन की गहराइयों में उतर सकता है और सच्ची आत्म-प्राप्ति कर सकता है। ध्यान से मन शांत होता है और आत्म-जागरूकता बढ़ती है, जिससे जीवन में शांति और संतुलन आता है। अकेलेपन को आत्मनिरीक्षण का अवसर मानकर अपनाएं, जिससे सच्चे आत्मबोध का अनुभव किया जा सके।

राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि चेतना का हर स्तर हमें खुद के अधिक करीब लाता है। जागृत अवस्था में हम पूरी तरह से सतर्क रहते हैं, सुप्ति में कुछ हद तक अनभिज्ञ, और तुरीय में हम अपने शुद्धतम स्वरूप में होते हैं। यह यात्रा हमें हमारे भीतर की सच्चाई से अवगत कराती है, जिससे जीवन में सच्ची शांति और आनंद का अनुभव होता है।

अध्यात्म ज्ञान के माध्यम से शिक्षा को स्कूल-कॉलेज की किताबों से परे तक ले जाता है। अमर उजाला में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत ने समझाया कि शिक्षा का उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना नहीं है, बल्कि जीवन की गहरी समझ और सार्थकता को बढ़ाना भी है। अध्यात्मिक शिक्षा मनुष्य को आत्म-ज्ञान और सही दिशा की ओर मार्गदर्शित करती है, जिससे जीवन में वास्तविक पूर्णता और संतुलन प्राप्त होता है।

"PETA recently gave Acharya Prashant the “Most Influential Vegan” award. In 2025, his foundation got an award for being the Best Animal Welfare Organisation for helping people live a more compassionate life and reducing the suffering of animals. He has spoken at more than 200 universities and colleges, including premier institutions like IITs, IIMs, AIIMS, BITS, and the University of California. In these sessions, he frequently asks students to look at not just the environmental impact of their food and lifestyle choices, but also the effect that they have on their own inner conditioning."

राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि द्वैत में जीने के लिए अद्वैत को भूलना जरूरी है। जब तक याद है, तब तक द्वैत है। अद्वैत से जुड़ा कोई अनुभव नहीं हो सकता, खासकर जब आत्मा के मुख से निकलता हो। राजा और बंदर की कहानी के माध्यम से वे समझाते हैं कि जब तक द्वैत है, तब तक चंचलता बनी रहती है। अद्वैत में सबकुछ शांत हो जाता है।

अमर उजाला में प्रकाशित आचार्य प्रशांत का यह लेख आध्यात्मिक ग्रंथों की महत्वपूर्णता पर प्रकाश डालता है। वे बताते हैं कि जीवन की समस्याओं का समाधान और आत्मिक शांति पाने के लिए ग्रंथों का अध्ययन कैसे सहायक हो सकता है। इस लेख में आचार्य ने ग्रंथों के अध्ययन की महत्ता और उनके जीवन में योगदान पर विस्तृत चर्चा की है।

दैनिक जागरण के इस लेख में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि प्रेमी वही कर रहा है, जो गुरु का काम है। तुम्हारे सभी संस्कारों को तुम्हें मुक्त कर रहा है। और जो ये ना करे, उसका प्रेमी बना मत लेना। प्रेम किसी की गुलामी करने का नाम नहीं है, बल्कि यह तुम्हें आत्मनिर्भर बनाता है। जब तुम किसी से प्रेम करते हो, तो तुम उसे उसकी अच्छाइयों और कमियों के साथ स्वीकार करते हो। यही सच्चा प्रेम है, जो तुम्हें सच्चाई और साहस के साथ जीना सिखाता है।

राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि वेदांत की मूल बातें समझें: "सत्य एक है," जो अपनी लीलाओं, मुक्तियों, और स्वेच्छाओं में अनेक रूपों में अभिव्यक्त होता है। वेदांत के अनुसार, अभिव्यक्त होना सत्य का स्वभाव है। अर्जुन की तरह हमें अपने भीतर की त्रिगुणात्मकता को पहचानना चाहिए और उसके पार जाना चाहिए। जब तक हम अपने मन को नियंत्रित नहीं करते, तब तक विवेक नहीं प्राप्त कर सकते।

अमर उजाला में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत बताते हैं मन चंचल जरूर होता है लेकिन इसकी चंचलता पर अगर आपने विजय पा ली तो यकीन मानें अपनी दुल्हना पर विजय पा ली। मन को सही दिशा में नियंत्रित करने के लिए अनुशासन और सतत अभ्यास आवश्यक हैं। जीवन में सच्चे लक्ष्य का निर्धारण करके, मानसिक शांति और सशक्तिकरण प्राप्त किया जा सकता है।

अमर उजाला में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत बताते हैं समस्याओं से डटकर सामना करना सीखो। इन समस्याओं से जब तक भिड़ोगे नहीं, तब तक अपनी ताकत का एहसास भी नहीं कर पाओगे और न ही जीवन में आगे बढ़ पाओगे।

Science addresses only that which is measurable, numerable, experienceable and perceivable through the senses. And there is a lot that involves human welfare, but cannot be the material subject of any science, technology or mathematics.

आचार्य प्रशांत के अनुसार प्रेम और मृत्यु साथ-साथ चलते हैं, जो जीवन के अमर पहलू हैं। राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित इस लेख में आचार्य बताते हैं प्रेम का सच्चा अर्थ है परम आनंद प्राप्त करना, जिसमें भौतिकता और आसक्ति का कोई स्थान नहीं। सच्चे प्रेम को समझने और आत्मसात करने के लिए हमें स्वयं को संकीर्णता और भ्रम से मुक्त करना होगा।