
उपनिषद् हमारे सर्वश्रेष्ठ ग्रंथो में हैं। ऋषियों ने उपनिषदों की रचना हमारे दुःखों की मुक्ति के लिए की है। उपनिषद् के प्रत्येक श्लोक हमारे दुःखों के समूल नाश के लिए पर्याप्त हैं परंतु यह तभी सम्भव है जब हम इन श्लोकों का सही अर्थ समझें।
इस कोर्स में आचार्य प्रशांत श्वेताश्वतर उपनिषद् के श्लोकों का अर्थ बता रहें हैं जिनमें वह अहंकार, द्रष्टा और आत्मा के वास्तविक अर्थ से हमें परिचित करवाते हैं।
इसमें आचार्य जी बताते हैं कि हम संसार के प्रभावों व परिस्थितियों के खेल के अलावा कुछ नहीं होते हैं। लेकिन परिस्थितियों का पुतला होना हमारी वास्तविक पहचान नही है, वह तो संसार का ही हिस्सा है और झूठा है।
वह जो सच्चा है वह इन सबका द्रष्टा, इन सबसे अलग और अपरिवर्तनीय है। वही आत्मा है, वही हमारी असली पहचान है।
श्वेताश्वतर उपनिषद् का स्थान ईशादि दस प्रमुख उपनिषदों में है। इसके वक्ता श्वेताश्वतर ऋषि हैं। इस उपनिषद् की विवेचनशैली बड़ी ही सुसम्बद्ध और भावपूर्ण है। यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत है। इसमें कुल छ: अध्याय हैं।
अध्याय 1 में जगत् कारण का निर्णय कर प्रण व चिन्तन पूर्वक ध्यानाभ्यास को ही उसके साक्षात्कार का साधन बताया गया है। इसका विशेष विवरण अध्याय 2 में है। अध्याय 2 में ध्यान की विधि व ध्यान के योग्य स्थान, यौगिक क्रियाओं का वर्णन व आत्म साक्षात्कार से सम्बंधित प्रश्नों पर प्रकाश डाला गया है। अध्याय 3 में एक सफल जीवन व उसकी उच्चतम संभावना व अध्याय 4 में मन की स्थिरता पर चर्चा की गयी है। अध्याय 5 और 6 में आंतरिक स्पष्टता के ऊपर ज़ोर दिया गया है।
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