
मन क्या है? विचारों का एक प्रवाह। यह प्रवाह उपयोगी है यदि यह अपनी मज़िल तक पहुँच कर शांत हो जाए लेकिन तब क्या करें जब यह बेकाबू होने लगे?
आधुनिक जगत में हर व्यक्ति इस समस्या से परेशान है। अपने ही मन के विचारों के आगे खुद को निर्बल पाता है। समाधान के रूप में निर्विचार की एक काल्पनिक स्थिति तक पहुँचने की कोशिश करने लगता है। इस व्यर्थ कोशिश से बचें।
अध्यात्म के मूल ग्रन्थ हैं— उपनिषद्। इस कोर्स में प्रमुख उपनिषदों में से एक श्वेताश्वेतर उपनिषद् के कुछ श्लोकों की सहायता से आचार्य प्रशांत आपको समझाते हैं: विचार का सही उपयोग, विचार की सीमा और कैसे विचारों के दल-दल से निकल कर सही कर्म में प्रवेश किया जाए।
कुछ बेहद अनूठे उदाहरणों और किस्सों की सहायता से वे हजारों सालों पहले कहे गए इन वचनों का आपके लिए उपयोगी व सरल बना देते हैं।
जो लोग अपने विचारों को समझना चाहते हैं व उन्हें उपयोगी दिशा देना चाहते हैं, उनके लिए यह कोर्स लाभकारी होगा।
श्वेताश्वतर उपनिषद् का स्थान ईशादि दस प्रमुख उपनिषदों में है। इसके वक्ता श्वेताश्वतर ऋषि हैं। इस उपनिषद् की विवेचनशैली बड़ी ही सुसम्बद्ध और भावपूर्ण है। यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत है। इसमें कुल छ: अध्याय हैं।
अध्याय 1 में जगत कारण का निर्णय कर प्रण व चिन्तन पूर्वक ध्यानाभ्यास को ही उसके साक्षात्कार का साधन बताया गया है। इसका विशेष विवरण अध्याय 2 में है। अध्याय 2 में ध्यान की विधि व ध्यान के योग्य स्थान, यौगिक क्रियाओं का वर्णन व आत्म साक्षात्कार से सम्बंधित प्रश्नों पर प्रकाश डाला गया है। अध्याय 3 में एक सफल जीवन व उसकी उच्चतम संभावना व अध्याय 4 में मन की स्थिरता पर चर्चा की गयी है। अध्याय 5 में आंतरिक स्पष्टता के ऊपर ज़ोर दिया गया है।
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