
मनुष्य ने पहियों के आविष्कार से लेकर अंतरिक्ष की खोज तक में जबरदस्त प्रगति की है। हमने प्रौद्योगिकी में असाधारण प्रगति देखी है जो हमें अपने घर के आराम से विश्व स्तर पर जोड़ती है। मानवता ने लगातार ऐसे आविष्कार किए जो नामुमकिन ही प्रतीत होते थे।
पर क्या बाहरी प्रगति से सच में हमारी आंतरिक बेचैनी कम हुई है? हर प्रकार के आराम और संसाधन होने के बाद भी क्या हम वास्तव से शांति से जीवन जी पाते हैं? क्या बेहतर संसाधनों से हमारी समझ वास्तव में गहराई है?
बाहरी प्रगति ने हमें बेहतर संसाधन तो दे दिए पर उनका सही इस्तेमाल हमने सीखा नहीं। ऐसा क्यों? क्योंकि हमारी आंतरिक प्रगति कभी हुई ही नहीं।
आंतरिक प्रगति से मन को स्थिर व चित्त को शांत बनाएँ।
आचार्य प्रशांत का यह सरल कोर्स "आंतरिक प्रगति के सूत्र" श्वेताश्वेतर उपनिषद् के अध्याय 4 के कुछ श्लोकों पर आधारित है।
श्वेताश्वतर उपनिषद् का स्थान ईशादि दस प्रधान उपनिषदों में है। इसके वक्ता श्वेताश्वतर ऋषि हैं। इस उपनिषद् की विवेचनशैली बड़ी ही सुसम्बद्ध और भावपूर्ण है। यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत है। इसमें कुल छ: अध्याय हैं।
यह पाठ्यक्रम अध्याय 4 के सत्रहवें श्लोक से बाइसवें श्लोक पर आधारित है। अध्याय 1 में जगत कारण का निर्णय कर प्रण व चिन्तन पूर्वक ध्यानाभ्यास को ही उसके साक्षात्कार का साधन बताया गया है। इसका विशेष विवरण अध्याय 2 में है। अध्याय 2 में ध्यान की विधि व ध्यान के योग्य स्थान, यौगिक क्रियाओं का वर्णन व आत्म साक्षात्कार से सम्बंधित प्रश्नों पर प्रकाश डाला गया है। अध्याय 3 में एक सफल जीवन व उसकी उच्चतम संभावना व अध्याय 4 में मन की स्थिरता पर चर्चा की गयी है।
आचार्य प्रशांत की इस स्पष्ट व सरल व्याख्या से एक आंतरिक प्रगति के सूत्रों के बारे में पता चलता है।
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