🇮🇳 एक सम्मान, एक अनुभव और स्वयं को जानने की यात्रा…
आज मेरे लिए एक विशेष और यादगार दिन रहा।
मुझे भारतीय सेना की Army Aviation के Director General एवं Colonel Commandant द्वारा Dedication & Excellence Appreciation से सम्मानित किया गया। यह सम्मान Army Aviation द्वारा आयोजित Essay Writing Competition में तृतीय स्थान प्राप्त करने के लिए मिला।
लेकिन इस उपलब्धि के पीछे की कहानी मेरे लिए इस सम्मान से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
निबंध का विषय था:
“FROM BASIC SKILLS TO TACTICAL READINESS: STRUCTURING BASIC & ADVANCED AVIATION TRAINING FOR RECRUITS.”
इस विषय पर लिखते हुए मैंने एक सैनिक के प्रशिक्षण, अनुशासन, शारीरिक क्षमता, तकनीकी दक्षता, व्यावहारिक अनुभव, सुरक्षा और एडवांस ट्रेनिंग जैसे विभिन्न पहलुओं को शामिल किया था।
लेकिन इन सबके बीच मैंने एक ऐसे पहलू को भी विशेष स्थान दिया, जिसे मैं एक सैनिक के जीवन में अत्यंत आवश्यक मानता हूँ — Self-Knowledge (आत्मज्ञान)।
निबंध के Knowledge Development भाग में मैंने लिखा था:
“Promotes self-knowledge and continuous growth.”
मेरा मानना है कि एक सैनिक के लिए केवल तकनीकी रूप से दक्ष होना या शारीरिक रूप से मजबूत होना पर्याप्त नहीं है। उसे स्वयं को जानना भी उतना ही आवश्यक है।
किसी भी युद्ध या संघर्ष के क्षेत्र में यदि एक सैनिक अपने भीतर के भय, भ्रम, पूर्वाग्रह और कमजोरियों को नहीं समझता, तो वह अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर सकता। आत्मज्ञान केवल एक बेहतर इंसान बनने के लिए ही नहीं, बल्कि एक बेहतर और अधिक सजग योद्धा बनने के लिए भी आवश्यक है।
शायद इस निबंध में मैंने जो लिखा, वह केवल किताबी ज्ञान नहीं था, बल्कि मेरे अपने जीवन में आए बदलावों का प्रतिबिंब था।
इस बदलाव के लिए मैं आचार्य प्रशांत जी और उनकी शिक्षाओं का हृदय से आभारी हूँ।
सच कहूँ तो उनकी शिक्षाओं और उनके द्वारा चलाए जा रहे कार्य ने मुझे भीतर से एक तरह से रेस्क्यू किया है। मुझे स्वयं को देखने, अपने विचारों और धारणाओं पर प्रश्न उठाने और जीवन को एक नई दृष्टि से समझने का अवसर दिया है।
एक और बात इस पूरी यात्रा को मेरे लिए विशेष बनाती है।
सम्मान प्राप्त करने से ठीक पहले, 31 अक्टूबर और 1 नवंबर को मुझे HIDP की विभिन्न Activities में भाग लेने और आचार्य जी के सान्निध्य में सत्रों में उपस्थित रहने का अवसर मिला।
इन दो दिनों में हुई गतिविधियों, चर्चाओं और आत्मचिंतन ने मुझे एक बार फिर स्वयं को देखने और समझने का अवसर दिया। उसके बाद इस सम्मान को प्राप्त करना मेरे लिए एक अलग ही अनुभव था।
आज मैं अपनी उपलब्धियों, असफलताओं, भय और परिस्थितियों को जिस तरह देख पा रहा हूँ, उसमें इन शिक्षाओं का बहुत बड़ा योगदान है।
आज जब मैं यह सम्मान प्राप्त करने पहुँचा, तब भी आचार्य जी की शिक्षाओं का एक बहुत व्यावहारिक अनुभव हुआ।
सामने एक बहुत वरिष्ठ अधिकारी थे। उनकी रैंक और पद को देखकर भीतर कहीं एक संकोच और डर था। लेकिन उसी समय आचार्य जी की एक सीख याद आई — सामने वाला भी एक इंसान है और तुम भी एक इंसान हो। रैंक और पद अपनी जगह एक तथ्य हैं, लेकिन उनके कारण स्वयं को छोटा क्यों समझना?
जब भीतर से यह समझ आई तो वह संकोच काफी हद तक समाप्त हो गया।
एक और बहुत सुंदर अनुभव रहा। इस अवसर पर मेजर अभिलाषा बराक से मिलने और बातचीत करने का अवसर मिला। भारतीय सेना की पहली महिला कॉम्बैट एविएटर के रूप में उनकी यात्रा और उपलब्धियाँ निश्चित रूप से प्रेरणादायक हैं।
मैंने उनसे कहा कि वे उन अनेक लड़कियों और महिलाओं के लिए एक बहुत अच्छा उदाहरण प्रस्तुत कर रही हैं, जो अभी घरों की सीमाओं में हैं और अपने सपनों को लेकर आगे बढ़ने का साहस जुटा रही हैं।
उन्हें देखकर आचार्य जी की एक बात याद आई:
"सुरक्षा नहीं, मकान में लड़की रहो उड़ान में।"
उनसे बातचीत करना और उनके साथ तस्वीर लेना भी मेरे लिए एक यादगार अनुभव रहा।
लेकिन इस पूरी यात्रा में एक बात और साझा करना चाहता हूँ।
मैं इस सम्मान को अपनी पहचान नहीं बनाना चाहता।
यह एक तथ्य है कि मैंने मेहनत की, प्रतियोगिता में भाग लिया और तीसरा स्थान प्राप्त किया। उसके परिणामस्वरूप मुझे यह सम्मान मिला। अच्छी बात है।
लेकिन क्या अब मुझे इस मेडल से जुड़ जाना चाहिए? क्या इसे अपने अहंकार का हिस्सा बना लेना चाहिए? बिल्कुल नहीं।
आचार्य जी की शिक्षाओं से यही समझ आया है कि बाहरी उपलब्धियाँ जीवन के तथ्य हैं, हमारी पहचान नहीं। कोई उपलब्धि हमारे भीतर अहंकार का कारण नहीं बननी चाहिए।
दिलचस्प बात यह है कि मैं तो लगभग भूल ही गया था कि एक साल पहले मैंने यह निबंध लिखा था। अचानक नाम आया कि मुझे इस प्रतियोगिता के लिए सम्मानित किया जा रहा है।
इसलिए इस सम्मान को भी जीवन की यात्रा का एक छोटा-सा पड़ाव ही मानता हूँ।
चरैवेति, चरैवेति।
चलते रहना है। सीखते रहना है। स्वयं को समझते रहना है। यात्रा अभी बहुत लंबी है।
आज पढ़ाई हो, प्रतियोगिताएँ हों, खेल हों, नई स्किल्स सीखना हो, पुस्तकें पढ़ना हो, संगीत और गिटार सीखना हो — जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ने की जो इच्छा और समझ विकसित हुई है, उसमें आचार्य जी की शिक्षाओं का बहुत बड़ा योगदान है।
मैं यह सब इसलिए साझा कर रहा हूँ क्योंकि मेरे जीवन में जो भी सकारात्मक बदलाव आया है, उसके पीछे इन शिक्षाओं की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
यह पोस्ट केवल एक पुरस्कार साझा करने के लिए नहीं है, बल्कि उस बदलाव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए है, जिसने मुझे अपनी उपलब्धियों और जीवन को देखने का एक नया नजरिया दिया।
आभार आचार्य जी।
आभार उनकी शिक्षाओं और इस कार्य में लगे सभी संस्था के लोगों का । 🙏
सम्मान मिला है, लेकिन मंजिल अभी नहीं आई है।
चरैवेति चरैवेति!
#VidyaAvidya
#Womenempowerment