अवलोकन
मैं हिमाचल प्रदेश के शिमला से हूँ। मेरा जन्मस्थान शिमला से लगभग 120 किलोमीटर दूर रोहड़ू है। मैं वहाँ करीब 15 साल रहा और उसके बाद शिमला आ गया।
उस गाँव में लोग बहुत ही ज़्यादा रूढ़िवादी और अंधविश्वासों से घिरे हुए हैं। मुझे बचपन से ही मन में जिज्ञासा रहती थी कि यहाँ परंपरा के नाम पर जो कुछ चलता है, जैसे जातिवाद, ऊँच-नीच और बलि-प्रथा इत्यादि, वह सब क्यों है? इन सब सवालों से मेरा मन घिरा रहता था। जब माता-पिता से पूछता, तो वे कहते कि हाँ, ऐसा ही चलता है, यही सब होता है और देवी-देवताओं के कहने पर होता है। लेकिन फिर भी मेरा मन बहुत बेचैन रहता था और उसमें कई सवाल उठते रहते थे।
उसके बाद जब मैं शिमला आया, तो अपनी पढ़ाई पूरी की और नौकरी करने लगा। मैंने होटल प्रबंधन का कोर्स किया था, इसलिए मुझे बाहर जाने का मौका मिला। लेकिन माँ ने मुझे कहा कि दुनिया अच्छी नहीं है। तू घर पर ही रह, तेरे सिवा मेरा यहाँ कोई नहीं है। बाहर के लोग गंदे होते हैं। तू सीधा-सादा है, तुझे अब लूट लेंगे और तुझे पता भी नहीं चलेगा।
ये सब बातें मेरे दिमाग में डाल दी गईं और मैंने हिमाचल में ही रहने का फैसला कर लिया। मुझे लोगों ने बहुत समझाया कि तू बाहर जा, दुनिया देख, घूम, तब पता लगेगा। तू बहुत कुछ सीखेगा भी। लेकिन माँ ने मेरे मन में जो डर बैठा दिया था, उसकी वजह से मैंने तय किया कि मैं हिमाचल में ही रहूँगा।
फिर जब मैंने आचार्य जी को सुनना शुरू किया, तो ज़िंदगी में स्पष्टता आई। समझ आया कि यात्रा करना, लोगों से मिलना, उन्हें जानना और समझना कितना ज़रूरी है। सत्रों से जुड़ने के बाद मेरे मन में जितने भी सवाल थे, सबका उत्तर मिल गया।
आज मैं हिमाचल से लगभग 2,000 किलोमीटर दूर ओडिशा घूमकर आ गया हूँ। जब शिमला से निकला, तो मन में वही सब डर थे कि लोग कैसे होंगे, मेरे साथ कुछ हो न जाए। लेकिन मैंने डर को एक तरफ़ रखा और निकल गया। यही सोचकर कि “तुलसी भरोसे राम के, निर्भय होइ के सोइ।” जो होगा, देखा जाएगा।
मैंने पहली बार ट्रेन में इतनी लंबी यात्रा की। तरह-तरह के लोग मिले और उनसे बातचीत हुई। वे सब ओडिशा के थे। जब मैंने उनसे कहा कि मैं हिमाचल से हूँ और ओडिशा घूमने जा रहा हूँ, तो वे हैरान हो गए। वे कहने लगे कि हिमाचल से तो बहुत कम लोग ओडिशा आते हैं। यहाँ तो पश्चिम बंगाल, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और असम जैसी जगहों से ही लोग घूमने आते हैं।
वे यह भी कह रहे थे कि हिमाचल तो बहुत ठंडा इलाका है, हम वहाँ नहीं रह सकते। मैंने ट्रेन में स्वेटर भी पहना हुआ था, इसलिए लोग मुझे देख रहे थे और बार-बार यही पूछ रहे थे कि आप कहाँ से हैं? 😊
मैंने ओडिशा में भुवनेश्वर और कोरापुट के पहाड़ी इलाकों की यात्रा की, जो मुझे बहुत पसंद आई।
मेरे मन में जो भी भ्रम और डर थे कि बाहर के लोग गंदे होते हैं, लूटते हैं, इत्यादि, वे सब दूर हो गए। मुझे समझ आया कि मैंने दूसरों के बारे में जो धारणाएँ बना रखी थीं, वे सही नहीं थीं। मेरा डर भी दूर हुआ।
यह सब आचार्य जी को सुनने की वजह से संभव हो पाया। अगर मैं उन्हें नहीं सुनता, तो शायद कभी हिमाचल से बाहर नहीं जा पाता और न ही अपने डर से आज़ाद हो पाता।
मैं आचार्य जी का बहुत आभारी हूँ। उन्हें धन्यवाद देता हूँ। 🙏🏻
अभी भारत में घूमने के लिए बहुत कुछ बाकी है। अब सब जगह घूमूँगा और देश को, यहाँ के लोगों को और उनकी विविधता को और करीब से जानूँगा-समझूँगा।
धन्यवाद, आचार्य जी! मुझे नया जीवन देने के लिए। 😊🙏🏻